जयपुर घराने के कथक आचार्य पंडित राजेंद्र गंगानी ने कहा- गुरु और पिता कभी अपना दुलार दिखाते नहीं हैं, उसे महसूस कराया जाता है। लेकिन गुरु की डांट आज भी मेरे कानों में गूंजती है। सबसे ज्यादा डांट मुझे समय की पाबंदी और रियाज को लेकर पड़ती थी। जयपुर घराने की कथक परंपरा को विश्व मंच पर पहचान दिलाने वाले प्रख्यात कथक आचार्य पंडित राजेंद्र गंगानी ने जयपुर में बुधवार को यह कहा। पंडित राजेंद्र गंगानी के पिता और कथक के महान गुरु स्वर्गीय पंडित कुंदनलाल गंगानी की 100वीं जन्मशती पर जयपुर में तीन दिवसीय समारोह 14 जुलाई से शुरू होगा। इस समारोह में देश-विदेश के नामचीन कथक कलाकार प्रस्तुतियां देंगे। इस खास मौके पर पंडित राजेंद्र गंगानी ने पिता की यादों, जयपुर घराने की विरासत, कथक साधना, लड़कों की कथक में भागीदारी और जयपुर कथक केंद्र की मौजूदा स्थिति पर दैनिक भास्कर के साथ खुलकर बातचीत की। सवाल: पिता और कथक के महान गुरु की जन्मशती पर आयोजन कितना खास होगा? पं. राजेंद्र गंगानी: यह आयोजन मेरे पिता और गुरु पंडित कुंदनलाल गंगानी की 100वीं जन्मशती को समर्पित है। यह केवल उनके प्रति हमारी श्रद्धांजलि है। इसमें तीन दिन तक कथक के अलग-अलग रंग, अलग-अलग स्वरूप और अलग-अलग आयाम जयपुर के कला प्रेमियों को देखने को मिलेंगे। हमारी कोशिश है कि जो कला से प्रेम करता है, उसे तीन दिन में कथक की विविधता का अनुभव हो। मेरी हमेशा से इच्छा रही कि इस मिट्टी से जुड़े कलाकार, जयपुर से जुड़े लोग और यहां की सांस्कृतिक विरासत से जुड़े सभी लोग इस आयोजन का हिस्सा बनें। पहले दिन 14 जुलाई को कार्यक्रम की शुरुआत मैं गुरु वंदना के साथ करूंगा। इसके बाद कोलकाता का प्रसिद्ध साधना ग्रुप प्रस्तुति देगा। फिर मनीषा गुलियानी जो प्रेरणा श्रीमाली की शिष्या हैं, वे अपनी एकल प्रस्तुति देंगी। पहले दिन का समापन पंडित राममोहन महाराज करेंगे, जो पंडित शंभू महाराज के सुपुत्र हैं। वे कथक जगत के प्रतिष्ठित कलाकार हैं। दूसरे दिन पं. चरण गरिधर चांद विशेष रूप से सिंगापुर से आएंगे। वे नारायण प्रसाद दादाजी के सुपुत्र हैं और हमारे गुरु परिवार से जुड़े हुए हैं। तीसरे दिन प्रेरणा श्रीमाली, शशि सांखला और शोभा दीदी सहित अनेक वरिष्ठ कलाकार मंच पर होंगे। सवाल: जयपुर घराने से आपका जुड़ाव और पिता की कोई सीख या याद, जो आज भी साथ है? पंडित राजेंद्र गंगानी: मेरे गुरुजी और पिता ने कभी इस मिट्टी को नहीं छोड़ा। उनकी कला पूरी दुनिया में पहुंची। आज कथक केवल जयपुर घराने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पूरी दुनिया में पहचान बना चुका है। वे जहां भी गए, अपने साथ राजस्थान की आत्मा लेकर गए। मीराबाई के पद, यहां की लोकधुनें, यहां की साहित्यिक परंपरा, रघुनाथ कंवर राम के भजन और रंगीला शंभू गौरा ले पधारो… जैसी रचनाएं हमेशा अपने साथ लेकर गए। उन्होंने राजस्थान की संस्कृति, यहां के भाव, यहां के रस और यहां की मिट्टी को कथक में जिस ऊंचाई तक पहुंचाया, वह कथक जगत के लिए बहुत बड़ी देन है। मैं उन सभी यादों को आज भी संजोकर चल रहा हूं। मैं ढाई-तीन साल की उम्र से ही उनके पीछे-पीछे घूमता था। उस समय भी मैं उनके पीछे था और आज भी मैं उनके पीछे ही हूं। फर्क सिर्फ इतना है कि आज वे ऊपर से मुझे देख रहे हैं। सवाल: कोई ऐसी याद जो हमेशा आपके साथ रहती है? चाहे उनकी डांट हो या प्यार। पंडित राजेंद्र गंगानी: गुरु और पिता कभी अपना दुलार दिखाते नहीं हैं, उसे महसूस कराया जाता है। अगर मैं थोड़ा भी लेट हो जाता था तो वे बहुत नाराज होते थे। वे हमेशा कहते थे कि समय पर काम करो। समय पर पहुंचो। समय का सम्मान करो। यही जिंदगी का सबसे बड़ा सिद्धांत है। दूसरी बात जो वे हमेशा कहते थे कि रियाज करो... रियाज करो... रियाज करो...। आज भी अगर मैं कहीं यात्रा पर हूं और किसी दिन रियाज नहीं कर पाता तो भीतर से ऐसा लगता है कि आज मैंने अपने जीवन का सबसे जरूरी काम अधूरा छोड़ दिया है। उनकी वही आवाज आज भी मेरे अंदर गूंजती रहती है। सवाल: आजकल लड़के कथक से दूर होते नजर आते हैं। पहले बड़ी संख्या में सीखते थे। आप इसे किस तरह देखते हैं? पंडित राजेंद्र गंगानी: मुझे खुशी है कि मेरे अनुभव कुछ अलग रहे हैं। मैं पिछले लगभग 40 साल से कथक सिखा रहा हूं। शुरू से मैंने यह तय किया था कि जितनी संख्या लड़कियों की होगी, उतनी ही संख्या लड़कों की भी होनी चाहिए। आज भी मेरे यहां बड़ी संख्या में लड़के कथक सीखते हैं। मैं हमेशा उन्हें यह समझाता हूं कि कथक केवल लड़कियों का नृत्य नहीं है। लड़कों की अपनी अलग ऊर्जा, अलग व्यक्तित्व और अलग प्रस्तुति होती है। उन्हें केवल यह समझने की जरूरत है कि नृत्य करते हुए भी वे अपनी पहचान बनाए रखें। यही सोच लेकर मैंने सालों तक काम किया और आज भी उसी दिशा में प्रयास कर रहा हूं। सवाल: राजस्थान के कलाकार जयपुर कथक केंद्र की स्थिति को लेकर चिंतित हैं। सरकार को कोई सुझाव देना चाहेंगे? पं. राजेंद्र गंगानी: मैं दिल्ली कथक केंद्र में गुरु के रूप में काम कर चुका हूं। जहां तक जयपुर कथक केंद्र की बात है, मुझे बचपन की एक घटना याद आती है। मेरे गुरुजी स्वयं जयपुर आए थे और प्रेस कॉन्फ्रेंस करके उन्होंने कहा था कि जब पूरी दुनिया में जयपुर घराने की चर्चा हो रही है तो जयपुर में कथक केंद्र क्यों नहीं है? उनके प्रयासों के बाद यहां कथक केंद्र की स्थापना हुई थी। पंडित गौरी शंकर और रामगोपाल जैसे अनेक लोगों ने भी इसके लिए प्रयास किए थे। वहीं आज जो चिंताएं सामने आ रही हैं, वे मेरे पास भी पहुंचती हैं। मुझे लगता है कि या तो सरकार इस विषय को गंभीरता से नहीं ले रही है, या फिर ऐसे दूरदर्शी गुरु नहीं मिल पा रहे हैं, जो इस संस्थान को नई दिशा दे सकें। किसी भी संस्था को आगे बढ़ाने के लिए केवल भवन काफी नहीं होता। उसके पीछे एक विजन होना चाहिए। सरकार को किसी संस्थान का केवल भवन देकर यह नहीं सोचना चाहिए कि अब काम पूरा हो गया। सरकार को यह भी देखना चाहिए कि वहां क्या हो रहा है? कलाकार कैसे तैयार हो रहे हैं? गतिविधियां कितनी हो रही हैं और संस्था आगे बढ़ भी रही है या नहीं। कथक जैसी परफॉर्मिंग आर्ट्स में सबसे जरूरी बात है कि मंच लगातार जीवित रहे। कलाकार लगातार प्रस्तुतियां दें। नई पीढ़ी तैयार हो। मेरी राय है कि सरकार विशेषज्ञों की एक मजबूत समिति बनाए, जो लगातार इन संस्थाओं का मार्गदर्शन करे। मैं केवल जयपुर कथक केंद्र ही नहीं, बल्कि राजस्थान संगीत नाटक अकादमी के लिए भी यही कहना चाहूंगा कि सरकार को इनके विकास के लिए अधिक गंभीर और दूरदर्शी दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। तभी हमारी सांस्कृतिक विरासत आने वाली पीढ़ियों तक मजबूती से पहुंच सकेगी।