राजस्थान की लोक संस्कृति की पहचान माने जाने वाले रजवाड़ी घूमर की गूंज अब रूस तक पहुंच गई है। जयपुर की नृत्यांगना सीमा राठौड़ ने रूस के कोस्त्रोमा शहर में आयोजित प्रतिष्ठित रूसी राष्ट्रीय बैले ‘कोस्त्रोमा’ के 35वीं वर्षगांठ समारोह में पारंपरिक रजवाड़ी घूमर की प्रस्तुति देकर अंतरराष्ट्रीय मंच पर राजस्थान की सांस्कृतिक विरासत का प्रतिनिधित्व किया। केंद्रीय संगीत नाटक अकादमी की ओर से चयनित चार सदस्यीय भारतीय कलाकार दल में शामिल सीमा ने अपनी प्रस्तुति के जरिए राजस्थानी लोकनृत्य की गरिमा, पारंपरिक वेशभूषा और भाव-भंगिमाओं से विदेशी दर्शकों को परिचित कराया। प्रजेंटेशन के बाद शुक्रवार को वह जयपुर लौट आईं, जहां परिवार के सदस्यों ने उनका स्वागत किया। ‘कंटिन्यूइंग ट्रेडिशंस, क्रिएटिंग द फ्यूचर’ यानी परंपराओं को आगे बढ़ाते हुए भविष्य का निर्माण थीम पर आयोजित इस समारोह में भारत के साथ चीन और मिस्र के कलाकारों ने भी अपनी सांस्कृतिक विरासत को नृत्य के माध्यम से प्रस्तुत किया। अलग-अलग देशों की नृत्य शैलियों के बीच भारतीय कलाकारों ने शास्त्रीय और लोक परंपराओं का ऐसा संगम पेश किया, जिसमें राजस्थान के घूमर से लेकर कथक, कुचिपुड़ी, असम और लद्दाख की नृत्य परंपराओं की झलक देखने को मिली। यहां देखिए सीमा राठौड़ के फोटोज… रजवाड़ी घूमर से दिखाया राजस्थान का सांस्कृतिक वैभव सीमा राठौड़ की प्रस्तुति समारोह के दौरान भारतीय लोक संस्कृति के प्रमुख आकर्षणों में रही। पारंपरिक रजवाड़ी घूमर में राजस्थानी संस्कृति की विशिष्ट पहचान मानी जाने वाली लय, मुद्राओं और वेशभूषा का खास महत्व है। घूमर की गोलाकार गतियां, घेरदार पारंपरिक पोशाक और संगीत के साथ कदमों का तालमेल इस नृत्य को अलग पहचान देते हैं। सीमा ने इसी पारंपरिक स्वरूप को अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रस्तुत कर राजस्थान की लोक विरासत की सुंदरता को सामने रखा। राजस्थान में घूमर केवल मनोरंजन या मंचीय प्रस्तुति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन का अहम हिस्सा रहा है। मांगलिक अवसरों, उत्सवों और पारिवारिक समारोहों में महिलाओं के सामूहिक नृत्य के रूप में इसकी विशेष पहचान रही है। सीमा की प्रस्तुति के जरिए इसी परंपरा को रूस के दर्शकों के सामने रखने का अवसर मिला। कथक-कुचिपुड़ी के साथ क्षेत्रीय लोकनृत्यों का संगम भारतीय प्रतिनिधिमंडल में सीमा राठौड़ के साथ कुचिपुड़ी कलाकार वसंत किरण रयासम, कथक कलाकार मेघारंजनी मेधी और लद्दाख की लोक कला से जुड़ी चुश्क अंगमो शामिल थीं। चारों कलाकारों ने भारत की अलग-अलग नृत्य परंपराओं का प्रतिनिधित्व किया। भारतीय दल की खासियत यह रही कि इसमें शास्त्रीय नृत्य के साथ क्षेत्रीय लोकनृत्यों को भी समान रूप से स्थान दिया गया। दल ने कथक और कुचिपुड़ी के साथ असम, लद्दाख और राजस्थान की नृत्य परंपराओं की प्रस्तुतियां दीं। इससे अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की सांस्कृतिक विविधता का व्यापक स्वरूप सामने आया। भारतीय कार्यक्रम का समापन ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना पर आधारित प्रस्तुति से हुआ। इसके माध्यम से विश्व बंधुत्व, आपसी सद्भाव और सांस्कृतिक एकता का संदेश दिया गया। रूसी बैले कलाकारों के साथ हुआ सांस्कृतिक संवाद समारोह में केवल मंचीय प्रस्तुतियां ही नहीं हुईं, बल्कि विभिन्न देशों के कलाकारों के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान के कार्यक्रम भी आयोजित किए गए। ‘सर्किल डांस ऑफ फ्रेंडशिप’ में रूसी बैले कंपनी और भारत सहित विभिन्न देशों के कलाकारों ने एक साथ नृत्य किया। इस सामूहिक प्रस्तुति में अलग-अलग देशों के कलाकारों ने एक मंच पर आकर दोस्ती और सांस्कृतिक एकता का संदेश दिया। वहीं ‘वॉयसेज ऑफ द वर्ल्ड’ कार्यक्रम में विभिन्न भाषाओं में शुभकामनाएं दी गईं। इस आयोजन के जरिए यह संदेश दिया गया कि कला और संस्कृति देशों की सीमाओं से परे जाकर लोगों को जोड़ने का काम करती हैं। नृत्य, संगीत और पारंपरिक अभिव्यक्तियों के माध्यम से अलग-अलग संस्कृतियों के बीच संवाद स्थापित किया जा सकता है। रूसी बैले स्कूल के विद्यार्थियों को समझाई भारतीय नृत्य परंपरा मुख्य समारोह से पहले अंतरराष्ट्रीय शैक्षणिक कार्यक्रम भी आयोजित किया गया। इसमें विभिन्न देशों से आए कलाकारों ने एक-दूसरे की नृत्य शैलियों को समझा और कार्यशालाओं के माध्यम से अपने अनुभव साझा किए। भारतीय प्रतिनिधिमंडल के कलाकारों ने रूसी बैले स्कूल के विद्यार्थियों को भारतीय नृत्य की प्रस्तुति शैली, क्षेत्रीय परंपराओं, पारंपरिक वेशभूषा और मंचीय अभिव्यक्ति के बारे में जानकारी दी। इस दौरान भारतीय नृत्य की विविधता और उसकी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को समझने का अवसर मिला। शास्त्रीय और लोकनृत्य की अलग-अलग शैलियों के जरिए भारतीय संस्कृति में परंपरा, भाव और सामूहिकता के महत्व को साझा किया गया। इस तरह आयोजन ने केवल प्रस्तुतियों तक खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि कलाकारों और विद्यार्थियों के बीच सीखने-सिखाने का मंच भी उपलब्ध कराया।