जयपुर में त्रिवेणी नगर की कच्ची बस्ती के बच्चे एक बार नाटक की प्रस्तुति देंगे। इंडियन वुमन इम्पैक्ट से जुड़े ये 20 बाल कलाकार 22 और 23 जुलाई को जवाहर कला केंद्र के कृष्णायन सभागार में प्रयोगात्मक नाटक सॉल्ट पेपर सिजर्स की प्रस्तुति देंगे। नाटक में उन बच्चों के संघर्ष, आत्मविश्वास और सपनों की कहानी दिखेगी, जिन्होंने सीमित संसाधनों के बावजूद रंगमंच को पहचान बनाया है। इस प्रस्तुति से पहले जवाहर कला केंद्र स्थित इंडियन कॉफी हाउस में नाटक की निर्देशिका मुदिता चौधरी, मूवमेंट डायरेक्टर कामाक्षी सक्सेना, सहायक निर्देशक गौरव कुमार और बाल कलाकार मंगलवार को मीडिया से रूबरू हुए। इस दौरान नाटक की रचनात्मक प्रक्रिया और फाउंडेशन की ओर से बच्चों के साथ किए जा रहे सामाजिक बदलाव के प्रयासों की जानकारी साझा की गई। यह प्रस्तुति नीरू सलूजा फाउंडेशन के सहयोग से आयोजित की जा रही है, जो रचनात्मक अभिव्यक्ति और मानवीय गरिमा को बढ़ावा देने के लिए कार्यरत है। कच्ची बस्ती से राष्ट्रीय मंच तक का सफर त्रिवेणी नगर की कच्ची बस्ती से आने वाले ये बच्चे 6 साल से राजस्थान सहित देश के कई मंचों पर प्रस्तुति दे चुके हैं। राजस्थान इंटरनेशनल सेंटर (RIC), जवाहर कला केंद्र (JKK) और राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (NSD) जैसे मंचों पर प्रस्तुतियों से ये बच्चे दर्शकों और रंगकर्मियों की सराहना बटोर चुके हैं। फाउंडेशन वर्तमान में 400 से अधिक बच्चों के साथ शिक्षा, थिएटर, पब्लिक स्पीकिंग, रोबोटिक्स और लाइफ स्किल्स पर काम कर रहा है। नाटक में दिखेगा घरेलू रिश्तों से युद्ध तक का सफर सॉल्ट पेपर सिजर्स प्रयोगात्मक (डिवाइज्ड थिएटर) प्रस्तुति है, जिसकी कहानी खाने की मेज के इर्द-गिर्द घटित होने वाली तीन घटनाओं पर आधारित है। नाटक में मध्यमवर्गीय परिवार की कहानी दिखेगी, जिसमें पति, पत्नी, उनका बच्चा और एक नौकर शामिल हैं। धीरे-धीरे सामान्य दिखाई देने वाला पारिवारिक माहौल भावनात्मक उपेक्षा, टूटते रिश्तों और दबी हुई हिंसा में बदल जाता है। नाटक में टूटी हुई डाइनिंग टेबल एक प्रतीक के रूप में इस्तेमाल की गई है, जो परिवार के बिखरे रिश्तों और भावनात्मक दूरी को दर्शाती है। संगीत, मूवमेंट और सादगीपूर्ण मंच सज्जा के जरिए यह प्रस्तुति दर्शकों के सामने एक बड़ा सवाल रखती है, क्या युद्ध केवल सीमाओं पर शुरू होते हैं या उनकी शुरुआत हमारे घरों और रोजमर्रा के रिश्तों से होती है? बच्चों ने खुद गढ़ी है अपनी सोच नाटक के चार प्रमुख कलाकार खुशी बैरवा, ओम शर्मा, मोनू भारती और शिव जारवाल अंतरराष्ट्रीय संबंधों और सामाजिक मुद्दों पर गंभीर रुचि रखते हैं। इंडियन वुमन इम्पैक्ट के कार्यक्रमों के माध्यम से उन्होंने वैश्विक राजनीति, लोकतंत्र और सत्ता की संरचनाओं को समझने का प्रयास किया है। इन्हीं अनुभवों के आधार पर तैयार यह प्रस्तुति यह संदेश देती है कि तानाशाही और हिंसा की शुरुआत संसद या युद्ध के मैदानों से पहले घरों के भीतर पनपती है। सपनों को मंच दे रहाफाउंडेशन नाटक में शामिल प्रत्येक बच्चा अपने-अपने क्षेत्र में बड़े सपने देख रहा है। कोई भारतीय विदेश सेवा में जाना चाहता है, कोई गेम डिजाइनर बनना चाहता है, कोई सामाजिक उद्यमी बनने का सपना देख रहा है तो कोई अंतरराष्ट्रीय बैले डांसर बनने की तैयारी कर रहा है। फाउंडेशन का उद्देश्य इन बच्चों को आत्मविश्वास देकर किसी मंच पर पहचान देना है।