जैसलमेर में सदियों पुरानी ओरण भूमि के संरक्षण और इसे सरकारी राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज कराने की मांग को लेकर एक आंदोलन खड़ा हो गया है। टीम ओरण के तत्वावधान में तनोट माता मंदिर से 400 किलोमीटर लंबी विशाल पदयात्रा शुरू हुई है, तो दूसरी तरफ फतेहगढ़ के देगराय मंदिर में 60 किलोमीटर लंबी दो दिवसीय परिक्रमा पूरी हुई है। गर्मी और धूप के बीच कई ओरण प्रेमी, पशुपालक और ग्रामीण नंगे पांव पैदल चलकर अपनी धरोहर को बचाने की पुरजोर आवाज उठा कर रहे हैं। इस पूरे अभियान का मुख्य उद्देश्य 600 साल पुराने और करीब 60 हजार बीघा में फैले ऐतिहासिक ओरण क्षेत्र को कानूनी पहचान दिलाना, सोलर-विंड कंपनियों के अतिक्रमण को रोकना और पर्यावरण संतुलन बनाए रखना है। सोलर प्रोजेक्ट्स पर लगे रोक, अंडरग्राउंड हो बिजली के तार देगराय मंदिर में जुटे ग्रामीणों और पर्यावरण प्रेमियों ने ओरण क्षेत्र में प्राइवेट कंपनियों की व्यावसायिक गतिविधियों और अतिक्रमण पर तुरंत रोक लगाने की मांग उठाई। क्षेत्र से गुजर रही भारी भरकम हाईटेंशन बिजली लाइनों के कारण राज्य पक्षी गोडावण और अन्य बेजुबान वन्यजीवों की जान पर लगातार खतरा बना हुआ है। ग्रामीणों ने मांग की है कि अदालती आदेशों की पालना करते हुए इन बिजली लाइनों को तुरंत अंडरग्राउंड किया जाए। 12 गांवों की पशुपालन संस्कृति बचाने का बड़ा संदेश यह विशाल ओरण भूमि न केवल गोडावण और चिंकारा जैसे दुर्लभ जीवों का प्राकृतिक घर है, बल्कि इसके आसपास बसे 12 गांवों की पारंपरिक पशुपालन संस्कृति का भी मुख्य आधार है। भीषण गर्मी में नंगे पांव चल रहे पदयात्रियों ने कहा कि अगर ओरण को तुरंत सुरक्षित नहीं किया गया तो क्षेत्र के हजारों मवेशियों के सामने चारे और पानी का बड़ा संकट खड़ा हो जाएगा। 6 पवित्र धामों से गुजरते हुए आगे बढ़ेगी पदयात्रा तनोट धाम से शुरू हुई 400 किमी की यह पदयात्रा अगले 12-13 दिनों में जिले के 6 सिद्ध धामों—घंटियालाय, पोकरणसर, कलेरुआं, भादरियाराय और देगराय माता मंदिर से होकर मां तेमडेराय धाम पहुंचेगी। रास्ते में हर गांव और ढाणी में चौपाल लगाकर ग्रामीणों को ओरण संरक्षण के प्रति जागरूक किया जा रहा है।