झालावाड़ की ऐतिहासिक भवानी नाट्यशाला ने गुरुवार को अपना 105वां स्थापना दिवस मनाया। इस अवसर पर आयोजित संगोष्ठी में वक्ताओं ने इसकी जर्जर होती स्थिति पर चिंता जताते हुए शीघ्र जीर्णोद्धार, यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल करने, नाट्य अकादमी स्थापित करने और इसे पर्यटकों व शोधकर्ताओं के लिए नियमित रूप से खोलने की मांग की। विशेषज्ञों ने इसे उत्तर भारत की दुर्लभ ओपेरा शैली की सांस्कृतिक धरोहर बताते हुए इसके संरक्षण को समय की आवश्यकता बताया। देश की दुर्लभ कला धरोहर कार्यक्रम के मुख्य अतिथि ठाकुर मंजीत सिंह कुशवाह ने कहा कि भवानी नाट्यशाला देश की एक दुर्लभ कला धरोहर है। इसका संरक्षण किया जाना चाहिए ताकि आने वाली पीढ़ियां इसके ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व को समझ सकें। उन्होंने इसे पर्यटकों और शोधकर्ताओं के अध्ययन का प्रमुख केंद्र बनाने पर भी जोर दिया। जीर्णोद्धार और सुविधाओं के विस्तार की मांग संगोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे प्रारंभिक शिक्षा विभाग के संस्थापन अधिकारी रामजीलाल मीणा ने प्रशासन से नाट्यशाला का जल्द जीर्णोद्धार कराने और यहां मूलभूत सुविधाओं का विस्तार करने की मांग की। उनका कहना था कि उपेक्षा के कारण यह ऐतिहासिक धरोहर लगातार बदहाल होती जा रही है। यूनेस्को सूची और नाट्य अकादमी का सुझाव पर्यटन विकास समिति के संयोजक ओम पाठक ने नाट्यशाला की अनूठी निर्माण शैली को देखते हुए इसे यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल कराने का प्रस्ताव रखा। उन्होंने यहां नाट्य अकादमी का कार्यालय स्थापित करने और नाट्यशाला को नियमित रूप से पर्यटकों व स्थानीय लोगों के लिए खोलने की भी मांग की, ताकि लोग इस ऐतिहासिक ओपेरा शैली की धरोहर से रूबरू हो सकें। इतिहास की अमूल्य विरासत इतिहासकार ललित शर्मा ने बताया कि भवानी नाट्यशाला का निर्माण तत्कालीन शासक महाराज राणा भवानीसिंह ने 16 जुलाई 1921 को कराया था। इसमें भव्य रंगमंच और 36 बालकनियां हैं। वर्ष 1921 से 1950 तक यहां देशी-विदेशी नाटकों का नियमित मंचन होता रहा। उन्होंने नाट्यशाला परिसर में इतिहास पट्टिका स्थापित कर प्रमुख नाटकों और कलाकारों का विवरण अंकित करने की मांग भी की। बदहाली पर चिंता वक्ताओं ने कहा कि उत्तर भारत की ओपेरा शैली में निर्मित यह ऐतिहासिक नाट्यशाला कभी सांस्कृतिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र थी, लेकिन आज सरकारी उपेक्षा के कारण बदहाली का शिकार है। एक समय यहां महाकवि कालिदास के 'अभिज्ञान शाकुंतलम्' सहित कई चर्चित नाटकों का मंचन हुआ। प्रसिद्ध सितार वादक पंडित रवि शंकर और उनके भाई उदय शंकर भी यहां प्रस्तुति दे चुके हैं। पहले यहां नियमित रूप से नाटकों का मंचन होता था, लेकिन अब यह विरासत संरक्षण की प्रतीक्षा कर रही है। इनकी रही मौजूदगी कार्यक्रम में भगवती प्रकाश मेहरा, सूरजकरण नागर, नफीस शेख, डॉ. नन्दसिंह राठौड़, फारूख अहमद, सुभाष सोनी, भूमिका भूषण, पदमसिंह चौहान, पदम गौड़, महेश शर्मा, डॉ. अलीम बेग, सुहास शर्मा, कन्हैयालाल कश्यप, लालचंद रेगर सहित अनेक लोगों ने नाट्यशाला के संरक्षण और विकास को लेकर अपने विचार रखे।