राजस्थान हाईकोर्ट जोधपुर मुख्यपीठ ने शहर में एयरफोर्स और आर्मी के ठिकानों के पास प्रतिबंधित जोन में निर्माण और अतिक्रमण को राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा मामला माना है। कोर्ट ने बिना एनओसी बनी इमारतों को हटाने के निर्देश दिए हैं। जस्टिस विनीत कुमार माथुर और जस्टिस चन्द्र शेखर शर्मा की खंडपीठ ने स्थानीय प्रशासन को पाबूपुरा स्थित खसरा नंबर 632 और इसके सभी सब डिवीजनों का तीन महीने के भीतर विस्तृत सर्वे करने को कहा है। कोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिया है कि यदि जांच में रक्षा मंत्रालय की अधिसूचनाओं का उल्लंघन पाया जाता है, तो कानून के अनुसार उन निर्माणों को हटाया जाए। संवेदनशील सैन्य ठिकानों के पास निर्माण का विवाद यह मामला मुख्य रूप से रोहित नायक व अन्य की ओर से दायर जनहित याचिकाओं के बैच पर सुनवाई के जरिए सामने आया। याचिकाओं में बताया गया कि जोधपुर के पाबूपुरा क्षेत्र के खसरा नंबर 632 में वायुसेना के रातानाडा एयरफोर्स स्टेशन और सेना के महत्वपूर्ण ठिकानों के पास प्रतिबंधित जोन में बिना मंजूरी निर्माण किए जा रहे हैं। याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि स्थानीय अधिकारियों ने रक्षा मंत्रालय द्वारा समय समय पर जारी अधिसूचनाओं व दिशा निर्देशों की अनदेखी करते हुए निर्माण की अनुमतियां जारी कर दीं। याचिकाओं में स्थानीय निकाय द्वारा जारी पट्टे, भूमि उपयोग परिवर्तन के आवेदन और वर्ष 2022 में गुजरात से जारी एक एटीसी एनओसी को चुनौती देते हुए इस क्षेत्र को 'नो कंस्ट्रक्शन जोन' घोषित करने की मांग की गई थी। केंद्र ने बताया सुरक्षा का उल्लंघन याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता मोती सिंह और सिद्धार्थ मेवाड़ा ने तर्क दिया कि केंद्र सरकार ने अपने अतिरिक्त हलफनामे में कई ऐसे अवैध निर्माणों का उल्लेख किया है जो सैन्य प्रतिष्ठानों की सुरक्षा सीमा में बने हैं, लेकिन स्थानीय प्रशासन ने उन पर कोई कार्रवाई नहीं की है। भारत सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल भरत व्यास ने वरिष्ठ अधिवक्ता के रूप में पक्ष रखते हुए बताया कि केंद्र सरकार ने रक्षा प्रतिष्ठानों के पास निर्माण के लिए स्पष्ट अधिसूचनाएं जारी कर रखी हैं।
उन्होंने अदालत को बताया कि प्रतिबंधित क्षेत्र में कुछ निर्माण व अतिक्रमण इन नियमों के विरुद्ध पाए गए हैं, जिन्हें हटाने की जरुरत है। उन्होंने स्पष्ट किया कि ऐसी अनुमतियों के लिए रक्षा मंत्रालय से 'अनापत्ति प्रमाण पत्र' (एनओसी) लेना अनिवार्य किया जाना चाहिए। वहीं, स्थानीय निकायों के वकीलों ने आश्वस्त किया कि वे पूरे क्षेत्र का विस्तृत सर्वे करेंगे और नियमों के विरुद्ध पाए जाने वाले निर्माणों पर कानूनी कार्रवाई करेंगे। राष्ट्रीय सुरक्षा के नियमों का कड़ाई से पालन जरूरी खंडपीठ ने मामले का विश्लेषण करते हुए स्पष्ट किया कि मामला राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा है, इसलिए वायुसेना और सेना के प्रतिष्ठानों के आसपास निर्माण की हर अनुमति रक्षा मंत्रालय की अधिसूचनाओं के सख्त अनुपालन के अधीन होनी चाहिए। कोर्ट ने पाया कि यदि प्रशासन ने बिना उचित एनओसी और रक्षा मंत्रालय की अनिवार्य शर्तों के विपरीत लेआउट प्लान या निर्माण अनुमति जारी की है, तो सर्वे के बाद ऐसी अनुमतियों को रद्द किया जाना चाहिए।
कोर्ट का अंतिम आदेश: तीन महीने में सर्वे और अनुपालना रिपोर्ट का निर्देश अदालत ने याचिकाओं का निस्तारण करते हुए स्थानीय अधिकारियों को निम्नलिखित कड़े निर्देश जारी किए हैं: • विस्तृत सर्वे: स्थानीय प्रशासन तीन महीने के भीतर खसरा नंबर 632 और इसके सभी सब डिवीजनों वाले पूरे क्षेत्र का गहन सर्वे और परीक्षण अभ्यास पूरा करेगा।
• उल्लंघन पर कार्रवाई: सर्वे के दौरान यदि कोई भी निर्माण रक्षा मंत्रालय की अधिसूचनाओं और अनिवार्य शर्तों के उल्लंघन में पाया जाता है, तो प्रशासन उसे कानून के अनुसार हटाने के लिए तत्काल कदम उठाएगा।
• अनुमति निरस्तीकरण: यदि कोई निर्माण अनुमति या लेआउट प्लान पहले से स्वीकृत है, लेकिन वह रक्षा मंत्रालय की गाइडलाइन के विरुद्ध है, तो ऐसी अनुमति को तत्काल रद्द किया जाए।
• अतिक्रमण हटाना: जो लोग सैन्य ठिकानों के पास प्रतिबंधित क्षेत्र में अनधिकृत रूप से कब्जा जमाए हुए हैं, उन्हें भी कानून के तहत हटाया जाए।
• भविष्य के निर्देश: भविष्य में इस क्षेत्र में कोई भी निर्माण अनुमति तभी दी जाएगी, जब वह रक्षा मंत्रालय की अधिसूचनाओं और एनओसी की अनिवार्य शर्तों का पूर्णतया पालन करती हो।
• अनुपालना रिपोर्ट: स्थानीय निकायों को इस पूरी कार्यवाही की कम्प्लायंस रिपोर्ट 03 अगस्त 2026 तक हाईकोर्ट के समक्ष अनिवार्य रूप से पेश करनी होगी।
कोर्ट ने इस विस्तृत आदेश के बाद मामले से जुड़ी अवमानना याचिकाओं को भी निस्तारित कर दिया।