उत्तर पश्चिम रेलवे के जोधपुर रेल मंडल ने पिछले साल बेकार पड़ी चीजों (स्क्रैप) को बेचकर 58 करोड़ रुपए कमाए हैं। यह अब तक की सबसे बड़ी कमाई है। पिछली बार के मुकाबले इस बार लगभग 43.48 करोड़ रुपए ज्यादा मिले हैं। इस तरह, मंडल ने कबाड़ बेचने में लगभग 300 प्रतिशत की बढ़ोतरी की है, जो कि एक बहुत बड़ी सफलता है। जोधपुर डीआरएम अनुराग त्रिपाठी ने बताया - वित्त वर्ष के लिए 15 हजार मीट्रिक टन कबाड़ हटाने का लक्ष्य रखा गया था। इसके मुकाबले मंडल ने 16,500 मीट्रिक टन स्क्रैप का सफलतापूर्वक निष्पादन किया है। त्रिपाठी ने इसे 'मिशन जीरो' की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया। उन्होंने इस उपलब्धि के लिए अधिकारियों और कर्मचारियों को बधाई देते हुए भविष्य में भी बेहतर परिणाम का लक्ष्य रखा है। एक नज़र में प्रमुख आंकड़े: ई-ऑक्शन से बढ़ा नॉन फेयर रेवेन्यू इस ऐतिहासिक सफलता का मुख्य आधार पारदर्शी ई-ऑक्शन प्रणाली रही। पुराने रेल ट्रैक, सिग्नलिंग सामग्री और अनुपयोगी मशीनों की पहचान कर उनका समयबद्ध निष्पादन किया गया। इससे रेलवे के गैर-किराया राजस्व ('नॉन फेयर रेवेन्यू) में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जिसका उपयोग अब यात्री सुविधाओं और बुनियादी ढांचे के विकास में किया जाएगा। सुरक्षा बढ़ी, आग और दुर्घटनाओं का जोखिम हुआ कम कबाड़ हटाना केवल कमाई का जरिया नहीं, बल्कि सुरक्षा का भी अहम हिस्सा है। पटरियों और यार्ड से लोहा हटने से ट्रेन संचालन अधिक सुरक्षित हुआ है। पुराने केबल और उपकरणों को हटाने से आग और शॉर्ट सर्किट जैसे खतरे भी घटे हैं। साथ ही, स्टेशनों पर विजिबिलिटी और निगरानी पहले से काफी बेहतर हुई है। कार्बन फुटप्रिंट में कमी से पर्यावरण संरक्षण स्क्रैप हटने से असामाजिक तत्वों के छिपने की जगहें खत्म हुई हैं और रेल परिसरों में स्वच्छता आई है। इसके अलावा, लोहे और अन्य धातुओं के रिसाइक्लिंग से प्राकृतिक संसाधनों की बचत हो रही है और औद्योगिक उपयोग में सामग्री के पुनः आने से कार्बन फुटप्रिंट में भी कमी दर्ज की गई है।