जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशम अधिशास्ता आचार्य महाश्रमण ने कहा कि साधक को आहार की आसक्ति और शरीर के प्रति ममत्व का त्याग कर अनासक्ति, संयम और मोक्ष की भावना को प्राथमिकता देनी चाहिए। योगक्षेम वर्ष के दौरान मुख्य प्रवचन में उन्होंने ‘भक्त प्रत्याख्यान से जीव क्या प्राप्त करता है’ विषय पर कहा कि भक्त प्रत्याख्यान साधक को सांसारिक आसक्तियों से दूर कर आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ाता है। जैन परंपरा में संथारा, संलेखना और अनशन का विशेष महत्व है। जीवन के अंतिम समय में स्वर्ग या देवलोक की आकांक्षा के बजाय मोक्ष की भावना रखनी चाहिए। उन्होंने कहा कि उम्र बढ़ने पर धर्म-साधना, स्वाध्याय, तप और जप पर अधिक ध्यान देना चाहिए। शरीर अधिक श्रम करने में सक्षम न हो, तब भी आध्यात्मिक साधना जारी रखनी चाहिए। कार्यक्रम में साध्वी स्मितप्रभा ने 28 दिन की मासखमण तपस्या का प्रत्याख्यान किया। सघन साधना शिविर के शिविरार्थियों ने जिज्ञासाएं रखीं, जिनका आचार्य ने समाधान किया। उन्होंने मुनि मधुकर स्वामी की 18वीं पुण्यतिथि पर उनकी सेवाओं का स्मरण करते हुए बताया कि उन्होंने आचार्य तुलसी और आचार्य महाप्रज्ञ की सेवा में महत्वपूर्ण योगदान दिया। आचार्य तुलसी ने उन्हें ‘संघ परामर्शक’ अलंकरण से सम्मानित किया था।