जयपुर। एमजेआरपी यूनिवर्सिटी के बायोटेक्नोलॉजी विभाग की ओर से ‘गुरु-शिष्य परंपरा’ कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की थीम ‘कलर्स ऑफ बायोटेक्नोलॉजी’ रखी गई, जिसमें विद्यार्थियों ने रचनात्मक प्रस्तुतियों और विषय आधारित गतिविधियों के माध्यम से जैव प्रौद्योगिकी के विभिन्न क्षेत्रों में उपयोग को समझाया और प्रस्तुत किया। आयोजन में विज्ञान के साथ रचनात्मकता और गुरु-शिष्य संबंधों का समन्वय देखने को मिला। कार्यक्रम में बायोटेक्नोलॉजी के विभिन्न उपयोगों को तीन प्रमुख रंगों, ग्रीन, रेड और येलो के माध्यम से प्रस्तुत किया गया। विद्यार्थियों ने इन रंगों के जरिए बताया कि जैव प्रौद्योगिकी का दायरा केवल प्रयोगशालाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका संबंध कृषि, पर्यावरण, स्वास्थ्य, खाद्य उत्पादन और ऊर्जा जैसे कई क्षेत्रों से है। ग्रीन बायोटेक्नोलॉजी के माध्यम से विद्यार्थियों ने पर्यावरण संरक्षण, कृषि विकास और टिकाऊ भविष्य में जैव प्रौद्योगिकी की भूमिका को सामने रखा। उन्होंने बताया कि आधुनिक जैव तकनीक का उपयोग प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के साथ सतत विकास को बढ़ावा देने में किया जा सकता है। कृषि क्षेत्र में इसके संभावित उपयोगों को भी विद्यार्थियों ने अपनी प्रस्तुतियों के माध्यम से समझाया। रेड बायोटेक्नोलॉजी को स्वास्थ्य और चिकित्सा क्षेत्र से जोड़ा गया। विद्यार्थियों ने चिकित्सा अनुसंधान और स्वास्थ्य सेवाओं में जैव प्रौद्योगिकी की उपयोगिता को सरल तरीके से प्रस्तुत किया। बेहतर स्वास्थ्य और जीवन की गुणवत्ता के लिए जैव तकनीक किस तरह उपयोगी हो सकती है, इसे विभिन्न गतिविधियों के माध्यम से समझाया गया। वहीं येलो बायोटेक्नोलॉजी के तहत खाद्य उत्पादन, ऊर्जा और स्वस्थ जीवन से जुड़े पहलुओं को प्रदर्शित किया गया। विद्यार्थियों ने वैज्ञानिक विषयों को आकर्षक और आसानी से समझ आने वाले तरीके से प्रस्तुत करते हुए बताया कि रोजमर्रा के जीवन से जुड़े कई क्षेत्रों में बायोटेक्नोलॉजी की महत्वपूर्ण भूमिका है। ज्ञान, परंपरा और विज्ञान का संगम कार्यक्रम का एक प्रमुख उद्देश्य विद्यार्थियों में वैज्ञानिक सोच विकसित करने के साथ गुरु-शिष्य परंपरा के माध्यम से ज्ञान और मार्गदर्शन के महत्व को समझाना रहा। ‘लर्निंग द पास्ट, इंस्पायरिंग द फ्यूचर’ की भावना के साथ विद्यार्थियों को बायोटेक्नोलॉजी के क्षेत्र में मौजूद नई संभावनाओं से परिचित कराया गया। कार्यक्रम के दौरान विद्यार्थियों ने अपने विषय को केवल सैद्धांतिक रूप में प्रस्तुत करने के बजाय रचनात्मक गतिविधियों के जरिए समझने और समझाने का प्रयास किया। इससे विज्ञान के विभिन्न पहलुओं को व्यावहारिक और रोचक तरीके से सामने लाने का अवसर मिला। आयोजन ने गुरु-शिष्य परंपरा, वैज्ञानिक सोच और भविष्य की संभावनाओं के बीच संबंध को भी रेखांकित किया।