न्यूजीलैंड में आम चुनाव के शुरुआती नतीजों ने सरकार बनाने का मुकाबला दिलचस्प बना दिया है। प्रधानमंत्री क्रिस्टोफर लक्सन की नेशनल पार्टी और उसके सहयोगी दलों को 130 सीटों वाली संसद में 67 सीटें मिलती दिख रही हैं। बहुमत के लिए 66 सीटों की जरूरत है। यानी लक्सन का गठबंधन बहुमत से सिर्फ एक सीट आगे है। वहीं, विपक्षी लेबर पार्टी और उसके सहयोगियों को कुल 56 सीटें मिलती दिख रही हैं। ऑपरच्युनिटी पार्टी को 7 सीटें मिलने का अनुमान है। अभी 3% वोटों की गिनती बाकी है। इनमें विदेश में रहने वाले न्यूजीलैंड के नागरिकों और कुछ अन्य मतदाताओं के विशेष वोट भी शामिल हैं। 97% वोटों की गिनती के बाद की स्थिति सत्ताधारी गठबंधन विपक्षी गठबंधन ऑपरच्युनिटी पार्टी को 7 सीटें मिलने का अनुमान है। लक्सन ने उनके साथ सरकार बनाने से इनकार किया है। अगर ऑपरच्युनिटी पार्टी विपक्षी गठबंधन के साथ आती है, तो भी उसके पास कुल 63 सीटें होंगी। कौन हैं प्रधानमंत्री पद के दो बड़े दावेदार? क्रिस्टोफर लक्सन: दूसरी बार सत्ता में बने रहने की कोशिश क्रिस्टोफर लक्सन की नेशनल पार्टी सेंटर-राइट यानी मध्य-दक्षिणपंथी विचारधारा वाली पार्टी है। उन्होंने 2023 के चुनाव में पार्टी को जीत दिलाई थी। इससे न्यूजीलैंड में 6 साल से चल रही लेबर पार्टी की सरकार खत्म हो गई थी। लक्सन की सरकार में एसीटी और न्यूजीलैंड फर्स्ट पार्टियां भी शामिल हैं। एसीटी को दक्षिणपंथी और न्यूजीलैंड फर्स्ट को राष्ट्रवादी व सामाजिक रूप से रूढ़िवादी पार्टी माना जाता है। हालांकि, प्रधानमंत्री बनने के बाद से लक्सन को अपनी पार्टी के भीतर भी चुनौतियों का सामना करना पड़ा। इस साल अप्रैल और अगस्त में पार्टी के कुछ सांसदों ने उनके नेतृत्व पर सवाल उठाए और उन्हें पद से हटाने की कोशिश की। दोनों बार वे अपनी कुर्सी बचाने में कामयाब रहे। उनकी सरकार को अर्थव्यवस्था में धीमे सुधार और गठबंधन के सहयोगियों के बीच मतभेदों को लेकर आलोचना झेलनी पड़ी है। क्रिस हिपकिंस: सिर्फ 9 महीने PM पद संभाल पाए थे विपक्षी लेबर पार्टी के नेता क्रिस हिपकिंस दूसरी बार प्रधानमंत्री बनने की कोशिश कर रहे हैं। वे 2008 में पहली बार सांसद बने थे। जनवरी 2023 में जैसिंडा अर्डर्न के इस्तीफे के बाद उन्होंने प्रधानमंत्री पद संभाला था। हालांकि, उनका कार्यकाल सिर्फ नौ महीने चला। अक्टूबर 2023 के चुनाव में लक्सन के गठबंधन ने जीत हासिल की और लेबर पार्टी सत्ता से बाहर हो गई। हार के बाद भी हिपकिंस पार्टी के नेता बने रहे। इस चुनाव में उन्होंने महंगाई से राहत देने, स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने और रोजगार के अवसर बढ़ाने पर जोर दिया। चुनाव में महंगाई, बिजली और इमिग्रेशन बड़े मुद्दे रहे 1. अर्थव्यवस्था और महंगाई कमजोर अर्थव्यवस्था, बेरोजगारी और बढ़ती महंगाई ने इस चुनाव में मतदाताओं की चिंता बढ़ाई। दोनों प्रमुख पार्टियों ने आर्थिक विकास और लोगों को राहत देने के वादे किए। नेशनल पार्टी सरकारी खर्च पर नियंत्रण रखकर बजट को फिर से फायदे में लाना चाहती है। वहीं, लेबर पार्टी घरेलू खर्च कम करने, सस्ती स्वास्थ्य सेवाएं और परिवहन सुविधा देने के साथ मकान और रोजगार पर निवेश बढ़ाना चाहती है। 2. बिजली और किराने का सामान बिजली और किराने के सामान की बढ़ती कीमतों को लेकर छोटी पार्टियों ने अलग-अलग प्रस्ताव रखे। न्यूजीलैंड फर्स्ट: बड़ी बिजली कंपनियों और प्रमुख सुपरमार्केट कंपनियों के ढांचे में बदलाव करना चाहती है। ग्रीन पार्टी: सरकारी बिजली कंपनी और सरकारी सुपरमार्केट चेन बनाने का प्रस्ताव दे रही है। पार्टी किराने के सामान की कीमतों पर सख्त नियंत्रण चाहती है। 3. टैक्स ग्रीन पार्टी अमीर लोगों, बड़ी कंपनियों और बैंकों पर ज्यादा टैक्स लगाने के पक्ष में है। इसके साथ ही ज्यादातर लोगों का इनकम टैक्स कम करने का वादा कर रही है। वहीं, ऑपरच्युनिटी पार्टी जमीन की कीमत के आधार पर टैक्स लगाने की बात कर रही है। 4. इमिग्रेशन और वोट देने का अधिकार चुनाव में विदेशियों के रहने के नियम और वोट देने का अधिकार भी मुद्दा बने। एसीटी पार्टी गंभीर अपराध करने वाले लोगों को न्यूजीलैंड से बाहर भेजने के पक्ष में है। न्यूजीलैंड फर्स्ट पार्टी वोट देने का अधिकार सिर्फ देश के नागरिकों तक सीमित करना चाहती है। फिलहाल न्यूजीलैंड में रहने वाले योग्य स्थायी निवासी भी वोट दे सकते हैं। इसके लिए उन्हें लगातार कम से कम 12 महीने देश में रहना जरूरी है। पार्टी इस नियम को बदलना चाहती है। हर तीन साल में होते हैं चुनाव, मतदाता डालते हैं दो वोट न्यूजीलैंड में हर तीन साल में आम चुनाव होते हैं। यहां मिक्स्ड मेंबर प्रपोर्शनल यानी MMP चुनाव प्रणाली लागू है। इस व्यवस्था में मतदाता दो वोट डालते हैं। पहला वोट: अपने इलाके के उम्मीदवार को। दूसरा वोट: अपनी पसंद की राजनीतिक पार्टी को। हर इलाके में सबसे ज्यादा वोट पाने वाला उम्मीदवार संसद में पहुंचता है। इसके अलावा देशभर में किसी पार्टी को मिले वोटों के अनुपात के हिसाब से भी उसे सीटें दी जाती हैं। संसद में आमतौर पर 120 सीटें होती हैं। लेकिन अगर कोई पार्टी अपने वोटों के अनुपात से ज्यादा निर्वाचन क्षेत्र जीत लेती है, तो उसकी अतिरिक्त सीटें बरकरार रहती हैं। इसे ओवरहैंग सीट कहते हैं। इससे संसद का आकार 120 से बढ़ सकता है। इस चुनाव में संसद की कुल सीटें 130 होने का अनुमान है। इसलिए बहुमत के लिए 66 सांसदों का समर्थन जरूरी है। गूगल पर न्यूजीलैंड ट्रेड कर रहा है… सोर्स- गूगल ट्रेंड्स -------------------------- यह खबर भी पढ़ें… इजराइल में नए प्रधानमंत्री का ऐलान आज: आइजनकोट को 6 पार्टियों का समर्थन; देश में कभी सिंगल पार्टी की सरकार नहीं बनी इजराइल में अगला प्रधानमंत्री कौन होगा इसका ऐलान राष्ट्रपति इसाक हर्जोग आज करेंगे। सरकार बनाने के लिए 61 सासंदों का समर्थन चाहिए। गादी आइजनकोट के गठबंधन को 6 पार्टियों के 67 सांसदों ने समर्थन दिया है। पूरी खबर पढ़ें…