प्रदेश में 4 साल से छात्रसंघ चुनाव नहीं हो रहे, लेकिन सरकारी कॉलेजों और यूनिवर्सिटी में वसूली जारी हुई। इस पर सवाल उठे तो नाम बदल दिए, लेकिन वसूली जारी है। प्रदेश के सबसे बड़ी राजस्थान यूनिवर्सिटी (आरयू) ने इस सेशन में छात्रसंघ चुनाव शुल्क का नाम बदलकर ‘छात्र कल्याण’ शुल्क कर दिया। उच्च शिक्षा विभाग ने भी सरकारी कॉलेजों को ‘स्टूडेंट्स यूनियन शुल्क’ का नाम बदलकर ‘विद्यार्थी निधि’ के नाम से शुल्क लेने का ऑर्डर निकाला है। ऐसा ही आदेश 2019 में भी निकाला था, लेकिन अब तक ‘स्टूडेंट्स यूनियन’ नाम पर ही प्रति छात्र 100 रुपए शुल्क लिया जा रहा था। आरयू ने 2.75 करोड़ लिए; आरयू में ही चार साल में छात्रसंघ शुल्क के नाम पर 2.75 करोड़ रुपए छात्रों से लिए गए हैं। इस सत्र से विश्वविद्यालय ने छात्रसंघ चुनाव शुल्क का नाम बदलकर छात्र कल्याण शुल्क कर दिया। आरयू में एडमिशन फीस के साथ प्रति छात्र 280 रुपए लिए जा रहे हैं। सुखाड़िया यूनिवर्सिटी में यह 210 रुपए शुल्क है। ऐसे ही संस्कृत विवि समेत अन्य विश्वविद्यालयों में फीस के साथ छात्रसंघ के चुनाव कराने के नाम पर शुल्क लिया जा रहा है। यूजी में 2.86 लाख और पीजी में 46 हजार सीटें प्रदेश के 600 से ज्यादा सरकारी कॉलेजों में यूजी में ही 2.86 लाख सीटें हैं। पोस्ट ग्रेजुएशन में 46 हजार सीटें हैं। हर छात्र से हर साल फीस के साथ 100 रुपए छात्रसंघ शुल्क के लिए जा रहे हैं। 4 साल में करीब 22 करोड़ रुपए लिए जा चुके हैं। अब इस इनकम को विद्यार्थी निधि मद में खर्च किया जाएगा, कॉलेज छात्र हित में खर्च कर सकेंगे। नोट: इस सत्र में भी 5 लाख से ज़्यादा छात्रों से शुल्क लिया गया है।}प्रदेश में सरकार को छात्रसंघ चुनाव शुरू करवाने चाहिए थे। 4 साल से छात्रसंघ चुनाव नहीं होने के बावजूद छात्रों से शुल्क वसूलना गलत है। चुनाव नहीं तो शुल्क भी तत्काल बंद करना चाहिए। -निर्मल चौधरी, पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष राजस्थान यूनिवर्सिटी