पांचना बांध के सातों स्लूस गेट खुलने के साथ ही कमांड एरिया की नहरों में पानी पहुंचा तो किसानों ने इसे सिर्फ सिंचाई की शुरुआत नहीं, बल्कि दो दशक लंबे संघर्ष की पहली जीत बताया। इन गेट का खुलना महज तकनीकी खामी दूर होना नहीं है। करीब दो दशक तक करौली और सवाई माधोपुर के 74 गांव पानी के मुद्दे पर दो हिस्सों में बंटे रहे। एक ओर कमांड एरिया के 35 गांव थे। इनका कहना था कि बांध का निर्माण सिंचाई के लिए हुआ है। ऐसे में नहरों में नियमित जलापूर्ति उनका अधिकार है। दूसरी ओर बांध के आसपास के 39 गांव थे। इन्हें आशंका थी कि यदि लगातार नहरों में पानी छोड़ा गया तो उनके क्षेत्र में भूजल स्तर और पेयजल स्रोत प्रभावित होंगे। यही मतभेद समय के साथ प्रशासनिक विवाद से राजनीतिक मुद्दा बन गया। गुड़ला गांव के बुजुर्ग श्रीपाल गुर्जर कहते हैं- विवाद न हमने बढ़ाया न ही मीणा समाज ने। हमें लड़ाने का काम सरकारों ने किया। पानी खोलने से हमें कोई दिक्कत नहीं है। हमारी बाकी मांगें नवंबर तक पूरी नहीं हुईं तो फिर आंदोलन करेंगे। पढ़िए पूरी रिपोर्ट… 30 जून की रात तीन मंत्रियों की मौजूदगी में हुई बैठक में तय हुआ था कि सात दिन के भीतर पांचना बांध की नहरों, गंभीरी नदी और गुड़ला लिफ्ट परियोजना में पानी छोड़ने की कार्ययोजना बनाई जाएगी। साथ ही 2026-27 के बजट में घोषित गुड़ला क्षेत्र के 21 राजस्व गांवों के लिए लिफ्ट सिंचाई योजना को नए स्वरूप में जल्द लागू करने पर सहमति बनी थी। इसके बाद 6 जुलाई को नई व्यवस्था के तहत बांध से पानी छोड़ा गया। एक गेट में तकनीकी खराबी आने से पानी कमांड एरिया के अंतिम गांवों तक पर्याप्त मात्रा में नहीं पहुंच सका। इससे नाराज किसानों ने कई स्थानों पर धरना-प्रदर्शन किए और जाम लगाया। बाद में विभाग ने लगातार काम कर 7 जुलाई को जाम गेट को दुरुस्त किया। तकनीकी खामी दूर होने के बाद नहरों में पानी का प्रवाह सामान्य हो गया। राजनीति और 'श्रेय की लड़ाई' ने बढ़ाया तनाव पांचना से प्रभावित अधिकांश गांव मीणा और गुर्जर बहुल हैं। ऐसे में आंदोलन धीरे-धीरे सामाजिक और राजनीतिक रंग भी लेने लगा। पूरे घटनाक्रम में विभिन्न नेताओं के बीच श्रेय लेने की होड़ भी दिखाई दी। कमांड एरिया के किसान पूरी क्षमता से पानी छोड़े जाने की मांग पर अड़े रहे, जबकि दूसरी ओर कुछ स्थानों पर विरोध और सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक टिप्पणियों से तनाव बढ़ गया। आखिरकार कृषि मंत्री डॉ. किरोड़ी लाल मीणा, गृह राज्य मंत्री जवाहर सिंह बेढम और अन्य जनप्रतिनिधियों के हस्तक्षेप के बाद अधिकांश धरने और जाम समाप्त हुए। 1972 की बाढ़ के बाद बनी थी परियोजना पांचना बांध की परिकल्पना 1972 की भीषण बाढ़ के बाद की गई थी। पूर्वी राजस्थान में जल प्रबंधन को मजबूत करने के उद्देश्य से भद्रावती, अटा, माची, बरखेड़ा और भैंसावत नदी के पानी को रोकने की योजना बनी। 1978-79 में निर्माण शुरू हुआ और 2004-05 तक बांध तैयार हो गया। सिंचाई विभाग के अनुसार परियोजना का कमांड एरिया करीब 9,985 हेक्टेयर निर्धारित किया गया। शुरुआती वर्षों में नहरों के माध्यम से किसानों को सिंचाई का पानी मिला और इससे करौली तथा सवाई माधोपुर के हजारों किसानों को लाभ हुआ। 2006 में शुरू हुआ विरोध, यहीं से बदल गई तस्वीर पांचना बांध से साल 1987 से 2005 तक कमांड क्षेत्र की नहरों में पानी छोड़ा जा रहा था। बाद में प्रदेश में गुर्जर आंदोलन के बाद उनकी मांगों पर विचार करते हुए सरकार ने नहरों में पानी छोड़ना बंद कर दिया। स्थिति 2006-07 में बदली, जब बांध के आसपास बसे गांवों ने नहरों में पानी छोड़े जाने का विरोध शुरू किया। इसके कारण साल 2006 से नहरों के अंत में बसे कमांड एरिया के 35 गांवों (मुख्य रूप से मीणा बहुल) के किसानों को सिंचाई का पानी नहीं मिल रहा है। इस मामले को लेकर हाईकोर्ट ने साल 2020 और इसी साल अप्रैल-मई में नहरों में पानी छोड़ने का आदेश दिया। बांध के पास बसे गुर्जर बहुल क्षेत्र के ग्रामीणों का कहना था कि जलाशय का स्तर घटने से उनके कुएं, ट्यूबवेल और पेयजल स्रोत प्रभावित होंगे। उन्होंने मांग रखी कि पहले लिफ्ट परियोजना के जरिए आसपास के गांवों तक पानी पहुंचाया जाए। इसके बाद सिंचाई के लिए पानी छोड़ा जाए। दूसरी ओर कमांड एरिया के मीणा बहुल गांवों के किसानों का कहना था कि सरकार बांध के मूल उद्देश्य से पीछे हट रही है। उनका तर्क था कि सिंचाई परियोजना बनाकर भी किसानों को लाभ नहीं दिया जा रहा। यहीं से विवाद लगातार गहराता गया। हाईकोर्ट ने आदेश दिए, लेकिन अमल नहीं हुआ विवाद बढ़ने पर कमांड एरिया के किसान राजस्थान हाईकोर्ट पहुंचे। अदालत ने अलग-अलग अवसरों पर नहरों में पानी छोड़े जाने के निर्देश दिए। इसके बावजूद आदेश जमीन पर लागू नहीं हो सके। प्रशासन हर बार कानून-व्यवस्था बिगड़ने की आशंका का हवाला देता रहा। स्थानीय विरोध और संभावित टकराव को देखते हुए पानी छोड़ने का निर्णय टाल दिया गया। इससे किसानों में यह धारणा मजबूत होती गई कि समस्या तकनीकी नहीं, बल्कि प्रशासनिक और राजनीतिक इच्छाशक्ति की है। हाल ही में विधायक रामकेश मीणा व अन्य की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए राजस्थान हाईकोर्ट ने अदालती आदेश की पालना नहीं होने पर नाराजगी जताई थी। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश संजीव प्रकाश शर्मा और जस्टिस मनीष शर्मा की खंडपीठ ने सरकार से पूछा है कि हाईकोर्ट के आदेश के बाद भी नहरों में पानी क्यों नहीं छोड़ा जा रहा है। इस पर सरकार ने अदालती आदेश की पालना के लिए 15 दिन का समय मांगा। कोर्ट ने सरकार को समय देते हुए कहा था कि अगर नहरों में पानी नहीं छोड़ा गया तो कलेक्टर और संबंधित अधिकारी 27 जुलाई को कोर्ट में पेश हो जाएं। जिसके बाद प्रशासन हरकत में आया था। 20 साल पहले शुरू हुआ विवाद क्या सचमुच खत्म हुआ विवाद? हालांकि नहरों में पानी पहुंचने से लंबे संघर्ष का एक अध्याय जरूर समाप्त हुआ है, लेकिन विवाद पूरी तरह खत्म नहीं माना जा रहा। बांध क्षेत्र के ग्रामीण अब भी लिफ्ट परियोजना और अन्य वादों के समय पर क्रियान्वयन पर नजर बनाए हुए हैं। युवा नेता हाकम बैंसला कहते हैं- हमारे संघर्ष का परिणाम अब दिख रहा है। अगर सरकार तय समय में वादे पूरे कर देगी तो विवाद खत्म हो जाएगा। जब नेता सत्ता में थे तब मुद्दा नहीं उठाया, विपक्ष में आए तो आंदोलन का हिस्सा बन गए। इस मुद्दे पर सिर्फ वोटों की राजनीति हुई। वहीं ग्राम उत्थान समिति के अध्यक्ष रघुवीर मीणा का कहना है कि भविष्य में यदि स्लूस गेटों का मोटरीकरण कर उन्हें स्वचालित प्रणाली से संचालित किया जाए तो जल प्रबंधन और अधिक प्रभावी हो सकेगा। … यह खबर भी पढ़ें… राजस्थान में 20 साल बाद खत्म हुआ पानी का विवाद:लोग बोले- राजनीति ने लड़ाई बड़ी बनाई, नेता भड़काते हैं; ग्रामीणों के बीच पहुंची भास्कर टीम राजस्थान की 5 नदियों से मिलकर बना पांचना बांध, जिसके पानी के लिए 74 गांवों के बीच 20 साल लंबा संघर्ष चला। जब भी पानी छोड़ने की बारी आती 39 गांव उसके हक में तो 35 गांव विरोध में खड़े हो जाते। एक दूसरे के खिलाफ धरने पर बैठ जाते, लेकिन अब ये ‘जंग’ खत्म हो गई है। (पूरी खबर पढ़ें)