उत्तर भारत में सर्दी की शुरुआत के साथ ही पश्चिमी राजस्थान की जीवनरेखा पौंग डैम पर जल संकट गहरा गया है। इस साल पौंग जलाशय पहले ही पूरा नहीं भर पाया था। अब तापमान गिरने और पहाड़ों में पानी जमने से जलाशय के तेजी से खाली होने का खतरा मंडराने लगा है। गुरुवार सुबह डैम का जलस्तर 1359.16 फीट दर्ज हुआ। डैम में पानी की आवक घटकर मात्र 2643 क्यूसेक रह गई है। इसके उलट यहां से निकासी 10,007 क्यूसेक की जा रही है। डैम में आने वाला पानी वहां से छोड़े जा रहे पानी का महज एक चौथाई ही बचा है। कैचमेंट एरिया में अच्छी बारिश नहीं होने पर इनफ्लो में और भारी गिरावट आना तय है। विशेषज्ञों के अनुसार अब अगले साल फरवरी के बाद बर्फ पिघलने पर ही डैम में पानी की आवक बढ़ सकेगी। तब तक राजस्थान में रबी फसलों की सिंचाई और कटाई का समय पूरा हो जाएगा। पौंग डैम में कम जलभराव और भारी निकासी के बीच आने वाले चार-पांच महीने सिंचाई और पेयजल प्रबंधन के लिहाज से बेहद नाजुक रहने वाले हैं। जैसलमेर जोन में हालात गंभीर, फरवरी 27 तक रहेगा संकट प्रदेश में जारी पंचायत चुनाव के माहौल के बीच राजस्थान की नहरी पट्टी में पानी की कमी एक बड़ा राजनीतिक और सामाजिक मुद्दा बन चुकी है। चुनाव प्रचार के दौरान गाँव-गाँव में पानी का संकट छाया हुआ है, जिसका सीधा असर चुनावी समीकरणों पर देखा जा रहा है। सत्तारूढ़ और विपक्षी दलों के नेता भी मान रहे हैं कि जिन क्षेत्रों में नहरी पानी पर्याप्त मात्रा में नहीं पहुँच पा रहा है, वहाँ जनता का रुख और राजनीतिक माहौल काफी बदला हुआ है। हालाँकि इस जनाक्रोश का असली असर तो चुनावी परिणाम आने के बाद ही स्पष्ट हो पाएगा, लेकिन जल संसाधन और नहर विभाग के लिए फरवरी तक का समय बेहद मुश्किलों भरा रहने वाला है। वर्तमान में नहरी व्यवस्था के तहत किसानों को तीन बारी (समूह) का पानी दिया जा रहा है। इसके बावजूद सीमांत ज़िले जैसलमेर को तीन समूह का पानी भी नसीब नहीं हो पा रहा है। स्थिति यह है कि चार समूह की बारी वाली नहरों में 10 दिनों तक पानी बुरी तरह से पिट गया (कम रहा)। ऐसे में आगामी फरवरी महीने तक सबसे ज़्यादा मुसीबत और आर्थिक संकट जैसलमेर ज़ोन के किसानों को झेलना पड़ रहा है। पानी की इस भारी किल्लत के बीच प्रथम स्टेज के नहरी क्षेत्र में किसानों का उग्र आंदोलन और विरोध-प्रदर्शन देखने को मिला है। वहीं दूसरी ओर, सेकंड स्टेज का किसान जैसे-तैसे मिल रहे सीमित पानी से ही अपनी फसलों को बचाने और गुज़ारा करने पर मजबूर है। मैं लगातार कह रहा हूँ कि जब तक हरिके बैराज पर स्काडा ऑटोमेटेड सिस्टम चालू नहीं होता, तब तक राजस्थान अपने पानी के पूरे हक के लिए तरसता रहेगा। मुख्य जलस्रोत पर पानी की प्राकृतिक कमी होना एक अलग बात है, लेकिन जो पानी हमारे हिस्से का आ रहा है, वह हमें पूरा मिले। इसके लिए प्रयास करना बिल्कुल अलग स्थिति है। जब तक पारदर्शी व्यवस्था नहीं बनेगी, राजस्थान का किसान ऐसे ही पानी के लिए संघर्ष करता रहेगा। नरेन्द्र आर्य, किसान नेता