किसान का जीवन सबसे ज्यादा फसलों पर टिका होता है। खेतों में फसलों की एक प्रहरी की तरह रक्षा करता है। फसल पकने के बाद कटाई करता है, जिससे उससे और उसके परिवार का पालन-पोषण होता है। वहीं एक किसान ऐसे हैं, जो अनाज सिर्फ इसलिए बोते है कि उसका दान कर सकें। वे अपने 1 बीघा खेत में बोए गेंहू को गरीबों की भूख मिटाने के लिए दान करते है। ऐसा वे करीब 3 साल से लगातार करते आ रहे है। खास बात है कि, वे न अपना नाम बताते है और न पता। उनका कहना है ये काम मैं सेवा भाव से करता हूं। किसी नाम के लिए नहीं। उनके गेंहू से अलवर शहर के गरीबों की भूख मिट रही है। इससे ही उन्हें संतोष मिलता है।
1 रुपए में मिलता भरपेट भोजन अलवर शहर के बिजली घर चौराहे पर करीब साढ़े 5 साल से 1 रुपए में भरपेट भोजन मिलता है। एक रुपए भी सम्मान का शुल्क है। किसी के पास नहीं होता, तब भी खाना खिलाया जाता है। दो वक्त का खाना खाने के लिए लंबी लाइन लगती है। सभी को दरी-पट्टी पर बैठाकर खाने का अवसर मिलता है। गरीबों को खाना खिलाने का काम विजन संस्थान की ओर से किया जा रहा है। यहां 4 साल से एक किसान अपनी पहचान छुपाकर 14 से 15 क्विवंट गेहूं गरीबों की रोटी के लिए भेजते है। किसान न नाम बताते और न पता संस्थान के हिमांशु शर्मा ने बताया कि 4 साल पहले की बात बताता हूं। जिस पिकअप से गेहूं आए, उसके ड्राइवर से उस व्यक्ति का फोन नंबर लेकर बात की थी। तब उन्होंने खुद को किसान बताया। उन्होंने कहा कि सबके सहयोग से ही हर दिन 800 से 1 हजार गरीबों को खाना मिल सकता है। उसमें मेरा भी छोटा सा सहयोग है। फोन पर किसान का नाम और पता पूछा लेकिन उन्होंने बताने से मना कर दिया। हमें कैसे जानते है और अनाज दान क्यों रहे है? इस बारे में किसान ने कहा था कि जब बार वे जिला हॉस्पिटल में किसी परिचित से मिलने आए थे। तब उन्होंने गरीबों को खाना खिलाते हुए देखा था। तब अनाज दान का ठान लिया था। किसान ने कहा कि गरीबों को खाना खिलाना बड़ा काम है। इसके लिए सबको सहयोग करने की जरूरत होती है। इसी मकसद से वे अनाज भेजते हैं लेकिन उनकी शर्त है कि उनका नाम व नंबर नहीं आना चाहिए। एक बीघा जमीन पर पैदा हुआ गेंहू किया दान इस बार भी किसान ने लोडिंग ट्रैंपों के ड्राइवर विकास राजपूत के जरिए गेंहू के बोरे भेजे थे। उन्होंने बताया कि वे अलवर शहर से 35 किलोमीटर ढहलावास गांव से अनाज लेकर आते है। वहां एक किसान ने पूरे एक बीघा में पैदा हुआ अनाज भेजा है। वे लगातार 4 साल से भेज रहे हैं। मई 2021 से हुई थी शुरूआत विजन संस्थान के प्रतिनिधि हिमांशु व चिंटू का कहना है कि कोरोना में खाने का संकट हो गया था। रोड पर आजीविका कमाने वालों को खाना तक नसीब नहीं हो रहा था। उस समय विजन संस्थान के नाम बिजली घर चौराहे पर एक रुपए में गरीबों को खाना खिलाना शुरू किया गया। पहले दिन से ही काफी लोग खाना खाने आने लगे। यहां जरूरतमंद को खाना मिलने लगा तो प्रशासन का भी पूरा सहयोग मिला। फिर आगे यह मुहिम बन गई। लोग जुड़ते गए। अब इस संस्थान से अलवर शहर व जिले के सैकड़ों लोग जुड़े हुए हैं। अब तो काफी लोग अपने छोटे बच्चों का जन्म दिन मनाने यहीं आते हैं। अलग-अलग परिवार भी जन्मदिन व मैरिज एनवर्सरी जैसे अवसरों पर खाना उपलब्ध कराने में सहयोग करते हैं। अब इस मुहिम को कुल 1771 दिन हो चुके हैं। अब तक 23 लाख थाली खाना खिलाया जा चुका है। एक दिन का करीब 14 हजार रुपए खर्च आता है। यह सब आमजन के सहयोग से जुटाया जाता है।