आज हनुमान जयंती है, प्रदेशभर में हनुमान मंदिरों में बजरंग बली का जन्मोत्सव मनाया जा रहा है। आज बात राजस्थान के ऐसे मंदिर की जिनकी मूर्ति सालासर बालाजी के साथ निकली थी। मान्यता है दोनों मूर्तियां खेत में एक साथ खुदाई के प्रकट हुई थी। ठाकुर ने सपने में हनुमान जी के आदेश पर मूर्तियों को 2 बैलगाड़ियों में रखा और उन्हें रवाना किया। बैल जहां-जहां रुके वहीं मंदिर बना दिए गए। एक बैल लाडनूं से 33 किमी दूर सालासर में रूका। जिसे आज दुनिया में सालासर बालाजी के नाम से जाना जाता है। वहीं एक बैल आसोटा से निकलकर 1 किमी दूर पाबोलाव तालाब में रुका। ये वहीं दूसरी मूर्ति थी जिसने खेत में खुदाई के दौरान दर्शन दिए थे। सिद्धपीठ पाबोलाव धाम के पीठाधीश्वर कहते हैं- यहां ऐसे सन्यासी हुए जो सिंह बनकर लोगों की रक्षा करते थे। नागौर के लाडनूं से 5 किमी दूर है आसोटा यहां स्थित हैं अग्रसिद्धपीठ पाबोलाव धाम पढ़िए पाबोलाव सिद्धपीठ की कहानी… 1811 में एक साथ मिली थी मूर्तियां पाबोलाव पीठाधीश्वर स्वामी कमलेश्वर भारती बताते हैं- सालासर के हनुमान जी और पाबोलाव के बाल हनुमान जी की प्रतिमाएं एक ही साथ आसोटा के एक खेत में निकली थी। यह दोनों ही प्रतिमाएं विक्रम संवत 1811 में एक खेत की जुताई के वक्त मिली थी। भारती कहते हैं- लाडनूं के छोटे से गांव आसोटा में एक किसान मोटाराम घीन्टाला अपने खेत में हल से जुताई कर रहे थे। इसी दौरान उनका हल खेत में रुक गया और बेल आगे नहीं बढ़ पाए। इस जगह किसान ने खुदाई की तो वहां बड़ा पत्थर नजर आया। जब इसको बाहर निकाला तो हनुमान जी की दो मूर्तियां निकली। मान्यता: हनुमान जी ने सपने में आकर दिया था आदेश भर्ती बताते हैं- किसान ने इस घटना की जानकारी गांव के ठाकुर को दी तो ठाकुर ने मूर्तियां अपने गढ़ में रखवा ली। रात को सोते समय ठाकुर को सपने में हनुमान जी ने आवाज लगाई। आदेश दिया कि सुबह मेरी मूर्तियों को दो बैल गाड़ियों में रवाना कर देना और जहां भी बैल रुके वहीं इनकी स्थापना कर देना। मान्यता के अनुसार, सुबह ठाकुर ने अपने सपने की बात सभी गांव वालों को बताई और दोनों मूर्तियों को बैलों पर रख कर रवाना किया गया। दोनों बैल गाड़ियों में से एक आसोटा से निकलकर 1 किमी दूर पाबोलाव तालाब के पास रुक गई। जैसा कि सपने में आदेश था ग्रामीणों ने उसी स्थान पर बाल हनुमान जी की मूर्ति वहीं स्थापित कर दी। दूसरी बेल गाड़ी यहां से 33 किमी दूर सालमसर जिसे आज हम सालासर के नाम से जानते हैं वहां जाकर रुकी। जिसकी स्थापना वहीं पर कर दी गई। आज वह स्थान सालासर बालाजी धाम के नाम से प्रसिद्ध है। शेर का रूप धारण कर लेते थे सन्यासी भारती ने बताया- पाबोलाव हनुमान मंदिर की है कि यहां लगातार 7 फेरी लगाने से हर मन्नत पूरी होती है। यह मंदिर पाबू जी राठौड़ द्वारा बनाए गए प्राचीन तालाब के किनारे बना हुआ है। यहां कई सिद्ध महात्माओं ने तपस्या की। किवंदती है कि यहां के एक सन्यासी बलभद्र भारती थे। वे अपने तपोबल से सिंह का रूप धारण कर लेते थे। इसके बाद शेर बन कर वे लोगों की रक्षा करते थे। भारती ने बताया- इस प्रतिमा में हनुमान जी बालस्वरूप में हैं। दाएं हाथ में पहाड़ और बाएं हाथ में गदा लिए हुए है। यह प्रतिमा हवा में उड़ते हुए प्रतीत होती है। पाबोलाव के इस सिद्धपीठ में मंगलवार और शनिवार के अलावा पूर्णिमा को भी भक्तों का तांता लगता है। मंदिर में वर्षभर धार्मिक आयोजन होते रहते हैं। स्थानीय लोगों के साथ साथ पंजाब और हरियाणा तक से श्रद्धालु यहां दर्शन करने आते हैं। सालासर जाने वाले श्रद्धालु भी यहां धोक लगाने जरूर आते हैं।