राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर मुख्यपीठ ने किन्नर (ट्रांसजेंडर) आरक्षण मामले में अपने पूर्व के फैसले में संशोधन किया है। कोर्ट ने थर्ड जेंडर संशोधन विधेयक पर की गई अपनी तीखी संवैधानिक टिप्पणी को हटा दिया है। जस्टिस अरुण मोंगा और जस्टिस योगेंद्र कुमार पुरोहित की खंडपीठ ने गुरुवार को एक अहम आदेश पारित करते हुए 30 मार्च के फैसले में बदलाव कर उपसंहार ('epilogue') की भाषा को अब केवल एक तटस्थ तथ्यात्मक विवरण तक सीमित कर दिया है। हालांकि, पूर्व के फैसले की मूलभावना और 3 प्रतिशत अंक पर कोई बदलाव नहीं किया गया है। इससे पहले 30 मार्च को कोर्ट ने ट्रांसजेंडर्स को सरकारी नौकरियों में 3 प्रतिशत अतिरिक्त अंक भार देने का फैसला सुनाया था, जिसके अंत में एक उपसंहार जोड़ा गया था। उसी के संबंध में पेश प्रार्थना पत्र पर सुनवाई करते हुए यह नया ऑर्डर जारी किया गया है। मांग खारिज- उपसंहार फैसले का हिस्सा और नजीर रहेगा सुनवाई के दौरान कोर्ट के समक्ष मांग रखी गई थी कि 30 मार्च के फैसले के उपसंहार को आदेश का हिस्सा नहीं माना जाए और न ही इसे नजीर के रूप में इस्तेमाल किया जाए। कोर्ट ने इस मांग को सिरे से अस्वीकार कर दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उपसंहार फैसले का अभिन्न अंग है और भविष्य के मामलों में नजीर के रूप में पूरी तरह मान्य रहेगा। भूलवश जुड़े तीन अनुच्छेद हटाए गए कोर्ट ने माना कि उपसंहार को दोबारा पढ़ने पर पाया गया कि उसमें भूलवश कुछ ऐसे अनुच्छेद (पैरा 3, 4 और 5) शामिल हो गए थे, जो न तो इरादतन थे और न ही जरूरी थे। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इन हटाए गए अनुच्छेदों में संसद द्वारा पारित 'ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2026' को संवैधानिक आधार से विपरीत बताते हुए सख्त टिप्पणी की गई थी। हटाए गए पाठ में यह चिंता जताई गई थी कि अपनी पहचान खुद तय करने का अधिकार अब प्रशासनिक जांच या सरकारी अनुमोदन पर निर्भर होने के खतरे में है। नया वाक्य जोड़- कानूनी स्थिति के अनुसार होगा पालन हटाए गए पाठ के स्थान पर खंडपीठ ने एक नया और तटस्थ वाक्य जोड़ा है। कोर्ट ने आदेश में लिखा कि मुख्य फैसले के निर्देश 30 मार्च 2026 की लागू कानूनी स्थिति के अनुसार दिए गए हैं और उसी के अनुरूप उनका पालन किया जाना है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संसद से विधेयक पारित होने के बाद, यह उपसंहार अब बदलते कानूनी परिदृश्य का तथ्यात्मक विवरण मात्र है। कोर्ट ने इसे राज्य सरकार के लिए एक सावधानी बताते हुए कहा कि नई आरक्षण नीति 30 मार्च 2026 को लागू कानूनी स्थिति के दायरे में ही बननी चाहिए। वेबसाइट से हटेगा पुराना फैसला, 'डी' पार्ट में रहेगा सुरक्षित अंतिम आदेश पारित करते हुए कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक निर्देश भी दिया है। कोर्ट ने निर्देश दिया कि 30 मार्च 2026 का मूल फैसला हाईकोर्ट की आधिकारिक वेबसाइट से हटा दिया जाए। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इसके स्थान पर अब यह नया और संशोधित आदेश अपलोड किया जाएगा, जबकि पुराने फैसले की हार्ड कॉपी केवल रिकॉर्ड के 'डी' भाग में सुरक्षित रखी जाएगी।