राजस्थान हाईकोर्ट ने हत्या के मामले में निचली अदालत द्वारा सुनाई गई फांसी की सजा को रद्द करते हुए आरोपी को बरी कर दिया है। न्यायमूर्ति विनीत कुमार माथुर और न्यायमूर्ति चंद्रशेखर शर्मा की खंडपीठ ने उदयपुर जिले के घासा थाना क्षेत्र के इस बहुचर्चित हत्या प्रकरण में फैसला सुनाते हुए आरोपी प्रेमलाल को बरी करने के आदेश दिए। खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा- परिवादी आरोपी के खिलाफ परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की पूरी और विश्वसनीय श्रृंखला स्थापित नहीं कर सका। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब साक्ष्यों की कड़ी अधूरी हो, तो ऐसे में संदेह का लाभ आरोपी को दिया जाना पूरी तरह से न्यायोचित है। इसी आधार पर कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को पलटते हुए आरोपी को तुरंत रिहा करने के आदेश दिए। फांसी की सजा की पुष्टि के लिए भेजा गया 'डेथ रेफरेंस' खारिज हाईकोर्ट ने मावली की सेशन कोर्ट द्वारा सुनाई गई मृत्युदंड की सजा और दोषसिद्धि को पूरी तरह निरस्त कर दिया है। इसके साथ ही, फांसी की सजा की पुष्टि के लिए हाईकोर्ट भेजे गए 'डेथ रेफरेंस' को भी खारिज कर दिया गया। अपीलार्थी (आरोपी) की ओर से पैरवी करते हुए वकील गौरव सिंह ने अदालत में कई महत्वपूर्ण दलीलें पेश कीं। इस पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने कहा- पूरा मामला केवल परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित था, लेकिन अभियोजन पक्ष 'लास्ट सीन टुगेदर' (घटना से ठीक पहले साथ देखे जाने) के सिद्धांत को विश्वसनीय ढंग से साबित करने में पूरी तरह नाकाम रहा। गवाहों के बयानों में विरोधाभास और सबूतों में कमी खंडपीठ ने मामले की जांच करने वाली एजेंसी की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल उठाए। कोर्ट ने पाया कि जिन गवाहों के बयानों को 'लास्ट सीन टुगेदर' का आधार बनाया गया था, उनके बयान घटना के काफी समय बाद दर्ज किए गए थे और उनमें कई बड़े विरोधाभास थे, जिससे उनकी विश्वसनीयता खत्म हो गई। इसके अलावा, जांच के दौरान किसी भी स्वतंत्र गवाह को शामिल नहीं किया गया, बरामदगी की प्रक्रिया में गंभीर कमियाँ थीं और इलेक्ट्रॉनिक व वैज्ञानिक साक्ष्यों की जाँच भी संतोषजनक नहीं थी। यहां तक कि मेडिकल और डीएनए (DNA) रिपोर्ट भी आरोपी की संलिप्तता को निर्णायक रूप से साबित नहीं कर सकीं। परिस्थितिजन्य साक्ष्यों में हर कड़ी का साबित होना ज़रूरी हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के स्थापित कानूनी सिद्धांतों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि परिस्थितिजन्य साक्ष्यों वाले मामलों में न्याय का नियम है कि अपराध की हर एक कड़ी संदेह से परे साबित होनी चाहिए। चूंकि इस मामले में साक्ष्यों की श्रृंखला अधूरी और कमजोर रही, इसलिए आरोपी को संदेह का लाभ मिलना ही चाहिए। इसी आधार पर कोर्ट ने आरोपी प्रेमलाल को बरी करते हुए निर्देश दिया कि यदि वह किसी अन्य मामले में वांछित नहीं है, तो उसे तत्काल जेल से रिहा किया जाए।