राजस्थान हाईकोर्ट ने मस्कुलर डिस्ट्रॉफी और दूसरी दुर्लभ बीमारियों से पीड़ित मरीजों की समस्याओं पर केंद्र और राज्य सरकार से जवाब मांगा है। कोर्ट ने केंद्र सरकार को 3 सप्ताह में शपथ-पत्र पेश करने और राज्य सरकार को वर्ष 2022 में बनाई गई कार्ययोजना पर अब तक हुए काम का ब्योरा देने के निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने 21 नवंबर 2025 को पांच मुद्दों पर सरकारों ने जवाब मांगा था, लेकिन बिंदुवार पेश करने पर नाराजगी जताई। इस पर सरकार ने तीन सप्ताह का समय मांगा। पाली की स्वावलंबन फाउंडेशन की जनहित याचिका में कहा गया कि मरीजों को समय पर जांच और इलाज नहीं मिल पा रहा है। साथ ही, 18 साल से ज्यादा उम्र के मरीजों को सरकारी योजना के तहत मदद नहीं मिलने और लंबे समय तक देखभाल की व्यवस्था की कमी जैसे मुद्दे भी उठाए गए हैं। जनहित याचिका में मरीजों की समस्याएं उठाईं याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. सचिन आचार्य, अधिवक्ता चयन बोथरा और सार्थक आसोपा ने पक्ष रखा। हाईकोर्ट ने दुर्लभ बीमारियों से जुड़े 5 प्रमुख मुद्दों पर सरकारों से जवाब मांगे थे। याचिका में बताया गया कि एम्स जोधपुर के सेंटर ऑफ एक्सीलेंस में आनुवंशिक जांच की सुविधा नहीं होने से मरीजों को निजी लैब में अधिक पैसे खर्च करने पड़ते हैं और रिपोर्ट मिलने में देरी होती है। एम्स जोधपुर को राजस्थान का एकमात्र सेंटर ऑफ एक्सीलेंस बताते हुए दूरदराज के मरीजों को इलाज के लिए लंबी दूरी तय करने और जेके लोन अस्पताल में दुर्लभ बीमारियों के इलाज के बजाय विभागीय व प्रशासनिक काम होने का मुद्दा भी उठाया गया। इलाज और सरकारी मदद की कमी का मुद्दा उठा याचिका में कहा गया कि मुख्यमंत्री आयुष्मान बाल संबल योजना में केवल 63 सूचीबद्ध दुर्लभ बीमारियों के इलाज का प्रावधान है। GNE मायोपैथी, बेकर मस्कुलर डिस्ट्रॉफी और लिम्ब गर्डल मस्कुलर डिस्ट्रॉफी जैसी बीमारियों के इलाज की व्यवस्था पर सवाल उठाए गए। योजना में 18 साल से कम उम्र के मरीजों को ही उपचार की सुविधा मिलने से वयस्क मरीजों को आर्थिक और चिकित्सकीय परेशानियां होने की बात कही गई। मरीजों के पुनर्वास, डे-केयर और लंबे समय तक देखभाल की कमी का मुद्दा भी उठाया गया। याचिका में जिला स्तर पर डे-केयर केंद्र बनाने, प्रशिक्षित कर्मचारियों से 24 घंटे देखभाल कराने और इन केंद्रों की निगरानी के लिए जिला कलेक्टर को नोडल अधिकारी बनाने का सुझाव दिया गया। केरल, तमिलनाडु और हरियाणा में दुर्लभ बीमारियों के मरीजों के लिए आर्थिक मदद और सहायक उपचार की व्यवस्थाओं का भी हवाला दिया गया। 12 अक्टूबर 2026 को हाईकोर्ट ने जवाबों पर जताई नाराजगी मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति संजय के. अग्रवाल और न्यायमूर्ति बलजिंदर सिंह संधू की खंडपीठ ने 12 अक्टूबर 2026 के आदेश में कहा कि 21 नवंबर 2025 को तय किए गए पांच मुद्दों पर सरकारों ने अपेक्षित जवाब बिंदुवार पेश नहीं किए हैं। सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने जवाब देने के लिए 3 सप्ताह का समय मांगा, जिसे कोर्ट ने स्वीकार कर लिया। हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार को 3 सप्ताह में शपथ-पत्र पेश करने और राज्य सरकार को मरीजों के लिए 1 अक्टूबर 2022 को पेश की गई कार्ययोजना पर अब तक हुई प्रगति का ब्योरा शपथ-पत्र के जरिए देने को कहा। मामले को 3 सप्ताह बाद फिर सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया गया है। अगली सुनवाई में सरकारों के जवाब से दुर्लभ बीमारियों के मरीजों के इलाज, आर्थिक सहायता, पुनर्वास और लंबे समय तक देखभाल के लिए उठाए गए कदमों की जानकारी सामने आ सकेगी।