राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर मुख्यपीठ ने कहा- नीट पीजी में राज्य कोटा काउंसलिंग में अन्य राज्यों के अनुसूचित जाति, जनजाति या ओबीसी उम्मीदवारों को आरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा। जस्टिस संजीत पुरोहित की एकल पीठ ने फेडरेशन ऑफ प्राइवेट मेडिकल एंड डेंटल कॉलेज ऑफ राजस्थान की याचिका खारिज कर दी। पीठ ने अहम और रिपोर्टेबल फैसले में स्पष्ट किया कि एक राज्य का आरक्षण दूसरे राज्य में लागू नहीं होता। दरअसल, उदयपुर के देबारी निवासी पुनीत मखीजा ने फेडरेशन के अधिकृत प्रतिनिधि के रूप में याचिका दायर की थी। याचिका में 18 फरवरी की बैठक के उस निर्णय को चुनौती दी गई थी, जिसमें अन्य राज्यों के रिजर्वेशन वर्ग के उम्मीदवारों को 'स्ट्रे वैकेंसी राउंड' में अनारक्षित मानते हुए घटे हुए प्रतिशत का लाभ देने से इनकार किया गया था। गौरतलब है कि नीट पीजी 2025-26 का परिणाम 19 अगस्त 2025 को घोषित हुआ था। ऑल इंडिया कोटे और राज्य कोटे की कई राउंड की काउंसलिंग (अक्टूबर 2025 से जनवरी 2026 तक) के बाद भी बड़ी संख्या में पीजी सीटें खाली रह गई थी। इस पर नेशनल बोर्ड ऑफ एग्जामिनेशन (NBE) ने 13 जनवरी 2026 को कट-ऑफ घटाई थी- संशोधन से पहले: सामान्य/ईडब्ल्यूएस के लिए 276 अंक (50वां पर्सेंटाइल) और एससी/एसटी/ओबीसी के लिए 235 अंक (40वां पर्सेंटाइल) निर्धारित थे। संशोधन के बाद: सामान्य/ईडब्ल्यूएस के लिए 103 अंक और एससी/एसटी/ओबीसी के लिए माइनस 40 अंक कर दिए गए। याचिकाकर्ता के वकील बोले- मेडिकल सीट खाली छोड़ना राष्ट्रीय बर्बादी याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ एडवोकेट एम.एस. सिंघवी और सहयोगी हेमंत बालानी ने तर्क दिया कि प्रतिशत घटाने के बावजूद बाहरी छात्रों को लाभ न देना व्यावहारिक रूप से 100 प्रतिशत मूल निवास आधारित आरक्षण है। उन्होंने 'इंडेक्स मेडिकल कॉलेज' और 'डॉ. तन्वी बहल' फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि मेडिकल सीटों को खाली छोड़ना राष्ट्रीय बर्बादी है। याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि जब आरक्षित सूची समाप्त होने पर सीट अनारक्षित हो जाती है तो उस पर बाहरी आरक्षित छात्रों को भी रियायती कट-ऑफ का लाभ मिलना चाहिए। साथ ही पूर्व में डॉ. दिव्यांशु चित्रवंशी को आरक्षित कट-ऑफ पर सामान्य सीट देने का उदाहरण पेश कर समानता की मांग की गई। सरकार का जवाब: पुरानी नीति और नेगेटिव इक्वलिटी राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता विज्ञान शाह और सरकारी वकील मिलाप चौपड़ा ने इन तर्कों का विरोध किया। उन्होंने बताया- 18 फरवरी का निर्णय कोई नया आदेश नहीं, बल्कि 'इंस्ट्रक्शन बुकलेट' के क्लॉज 4 का स्पष्टीकरण मात्र है, जिसमें पहले से लिखा है कि आरक्षण केवल राजस्थान के मूल निवासियों को मिलेगा। सरकारी वकील ने कहा- फेडरेशन ने पूरी काउंसलिंग प्रक्रिया में इस क्लॉज को कभी चुनौती नहीं दी, इसलिए अब अंतिम चरण में आपत्ति जताना गलत है। इन्होंने सुप्रीम कोर्ट के 'मरी चंद्रशेखर राव' और 'बीर सिंह' फैसलों का हवाला देते हुए बताया कि एक राज्य में आरक्षित व्यक्ति दूसरे राज्य में वही दर्जा नहीं मांग सकता। डॉ. चित्रवंशी के मामले में उन्होंने स्पष्ट किया कि वह प्रवेश 'ऑल इंडिया कोटे' की अलग प्रक्रिया में हुआ था और किसी संभावित गलती के आधार पर 'नेगेटिव इक्वलिटी' का दावा कानूनन अमान्य है। कोर्ट का विश्लेषण: अनुच्छेद 341 व 342 का स्पष्ट संदेश दोनों पक्षों को सुनने के बाद अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 341, 342 और 342A का विश्लेषण किया। कोर्ट ने माना कि इनमें प्रयुक्त वाक्यांश "उस राज्य के संबंध में" स्पष्ट करता है कि आरक्षण पूरी तरह राज्य-विशिष्ट (state-specific) होता है। राजस्थान आरक्षण अधिनियम-2008 और स्नातकोत्तर चिकित्सा शिक्षा विनियम-2023 (PGMER-2023) के क्लॉज 4.8 से भी यही निष्कर्ष निकलता है। कोर्ट ने 'मरी चंद्रशेखर राव' और 'रंजना कुमारी बनाम उत्तराखंड' मामलों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि एक राज्य का आरक्षित व्यक्ति दूसरे राज्य में उसी दर्जे का दावा नहीं कर सकता। ऐसा करने पर उस राज्य के वास्तविक जरूरतमंद अभ्यर्थियों का हिस्सा छिन जाएगा। अनारक्षित सीट पर आरक्षित कट-ऑफ का दावा खारिज अदालत ने फेडरेशन की 100 प्रतिशत मूल निवास आरक्षण की दलील को अस्वीकार करते हुए स्पष्ट किया कि बाहरी छात्र पूरी तरह बाहर नहीं हुए हैं। वे 103 अंक (सामान्य कट-ऑफ) हासिल कर अनारक्षित सीटों के लिए पात्र हैं। कोर्ट ने माना कि जब सीट अनारक्षित हो जाती है, तो उसे अनारक्षित श्रेणी के मानकों के अनुसार ही भरा जाएगा। वहां रियायती कट-ऑफ देना विधिक ढांचे के खिलाफ होगा। अदालत ने स्पष्ट किया कि सीटें खाली न रहें यह जरूरी है, लेकिन इसके लिए संवैधानिक ढांचे से बाहर नहीं जाया जा सकता। इन सभी कानूनी आधारों पर कोर्ट ने याचिका और स्टे पिटीशन खारिज कर दी।