राजस्थान के एक भारतीय पुलिस सेवा (IPS) के अधिकारी को उनके साले के 4 साल के नाबालिग बेटे की कस्टडी मिली है। साले ने जबरन कब्जे में रखने का आरोप लगाया था। बच्चे के माता-पिता ने आईपीएस अधिकारी और उनकी पत्नी से बच्चे को वापस दिलाने के लिए हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। हाईकोर्ट ने माता-पिता को बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका में राहत देने से इनकार कर दिया। जस्टिस इंद्रजीत सिंह और जस्टिस भुवन गोयल की बेंच ने बच्चे को गैर-कानूनी हिरासत में नहीं माना और बच्चे की सुपुर्दगी के लिए अलग से याचिका दायर करने के निर्देश दिए। दरअसल, बच्चे के पिता का कहना था कि उनकी बहन और आईपीएस की पत्नी का आईवीएफ ट्रीटमेंट चल रहा है। बहन ने कहा था कि डॉक्टर ने उन्हें कहा है कि घर में बच्चों के साथ रहने से उनका इलाज बेहतर होगा। उन्होंने अपने बेटे को कुछ दिनों के लिए बहन के पास भेजा दिया था। लेकिन अब पति-पत्नी उनके बेटे को वापस लौटाने से इनकार कर रहे हैं। जबकि उन्होंने अपने बेटे को न तो गोद दिया न ही आईपीएस पति और उनकी पत्नी ने उसे कानूनी तौर पर गोद लिया है। ऐसे में उनके बच्चे को जबरन रखना गैर-कानूनी हिरासत में रखना है। वह बच्चे के जैविक माता-पिता हैं, इसलिए बच्चे को उन्हें वापिस सुपुर्द करने के आदेश दिए जाए। बच्चे के माता-पिता ने फोन पर मंजूरी दी इसके जवाब में आईपीएस अधिकारी और उनकी पत्नी ने कोर्ट को बताया कि उन्होंने बच्चे को गोद ​लिया है। 8 मई 2025 को गोद लेने का कार्यक्रम आगरा में हुआ था। बच्चे के माता-पिता ने भी फोन पर ही मंजूरी दे दी थी। तभी से बच्चा उनके साथ रह रहा है। वे उसे प्रतिष्ठित स्कूल में पढ़ा रहे हैं। आईपीएस अधिकारी होने के कारण वे बच्चे को बेहतर शिक्षा और पालन-पोषण दे सकते हैं। कोर्ट ने कहा-बच्चा अवैध हिरासत में नहीं कोर्ट ने कहा- बच्चे को उसकी बुआ-फूफा के पास खुद जैविक माता-पिता ने मर्जी से छोड़ा था। इसलिए वर्तमान स्थिति को बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका के दायरे में अवैध हिरासत नहीं माना जा सकता है। बच्चा काफी समय से इनके साथ रह रहा है। वह अपने वर्तमान वातावरण में व्यवस्थित हो चुका है। ऐसी स्थिति में फिलहाल उसके हित में यही है कि बच्चा जहां रह रहा है, वहीं रहे। कोर्ट ने कहा- इस पूरे मामले में गोद लेने को लेकर विवाद है। लेकिन इसका फैसला बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका में नहीं किया जा सकता है। यह निर्णय सक्षम सिविल न्यायालय ही करेगा।