नमस्कार जयपुर के बस्सी में सरपंच मैडम ने चप्पल से समाधान निकालने की कोशिश की। कोटा में आत्मनिर्भर बिजली मीटर बदल दिया गया और टोंक में बच्चे पानी भरे रास्ते से स्कूल जा रहे हैं। राजनीति और ब्यूरोक्रेसी की ऐसी ही खरी-खरी बातें पढ़िए, आज के इस एपिसोड में.. 1. पंचायत में चप्पल से समाधान आपने पंचायत सीरीज देखी होगी। मारपीट करने वाले दो पक्षों को पकड़ने के बाद थाने में दो पुलिस अधिकारी आपस में बात करते हैं। एक कहता है- तोड़-फोड़, मार-पिटाई, चिल्लम-चिल्ली, लगता है पंचायत चुनाव आने वाले हैं। राजस्थान में पंचायत चुनाव अभी डिक्लेयर नहीं हुए हैं, लेकिन किसी भी वक्त हो सकते हैं। ऐसे में जयपुर के बस्सी की सांभरिया पंचायत में माहौल गर्म है। पंचायत समिति में विकास के मुद्दों को लेकर मीटिंग चल रही थी। विरोधी वार्ड मेंबरान ने सरपंच साहिबा पर फाइल गायब करने का आरोप लगा दिया। मैडम आरोप झेल नहीं पाईं। वे आपे से बाहर हो गईं। कुर्सी से उछलकर खड़ी हुईं और चप्पल निकाल कर हाथ में ले ली। बड़ी मुश्किल से उन्हें वहां मौजूद साहब-साहिबान ने काबू किया। यह अदावत नई नहीं। सुनने में आया है कि सरपंच मैडम और उप सरपंच साहब के बीच छत्तीस का आंकड़ा है। जो बढ़ते-बढ़ते छत्तीसगढ़ हो गया है। सरपंच की ओर से उप-सरपंच पर तोहमतें लगाई जाती रही हैं और उप-सरपंच की ओर से सरपंच पर। एक बार तो उप-सरपंच साहब ने लंबा-चौड़ा लेटर लिखकर मैडम की शिकायत कर दी जिसे खारिज कर दिया गया। फिर उप-सरपंच पर फाइलें घर ले जाने के आरोप लगे। नाराज होकर उप-सरपंच टंकी पर चढ़ गए थे, जिन्हें उतारने के लिए तहसीलदार-बीडीओ को हाथा-जोड़ी करनी पड़ी। फिलहाल दोनों पक्ष अपने-अपने हथियार पैने करके बैठे हैं। अब तो बस चुनाव हो ही जाए। 2. आत्मनिर्भर मीटर चेंज आत्मनिर्भर भारत की राह में नए-नए इनोवेशन हो रहे हैं। इस बीच कोटा में आत्मनिर्भर बिजली मीटर भी सामने आया। आरकेपुरम सेक्टर-बी में रहने वाले निरंजन सिंह के मकान का काम चल रहा था। मकान खाली था। इस बीच बिजली कनेक्शन हुआ। कोटा डिस्कॉम लिमिटेड वाले एक बिजली मीटर लगा गए। मीटर का तार भी नहीं जुड़ा था कि रीडिंग की बत्ती चालू। इस मीटर ने उन शूरवीरों की याद दिला दी जो युद्ध में सिर कटने के बाद भी दोनों हाथों से तलवार चलाते रहते थे। मीटर जांबाज निकला। निरंजन हैरान। एमसीबी चेक की। लाइट चेक की। लाइन चेक की। लेकिन जब तार ही हटा हुआ है तो मीटर कैसे चल सकता है? शिकायत की गई। बिजली वाले आए और आत्मनिर्भर मीटर को उतार ले गए। नया मीटर लगा गए। अब चमत्कारी मीटर की जांच लैब में की जाएगी। अब निरंजन को अगले बिजली बिल का इंतजार है। वह सोच रहे हैं कि ‘चमत्कार’ का कितना भुगतान करना पड़ेगा। 3. चलते-चलते.. भक्त शिरोमणि मीराबाई ने लिखा था- ऊंची नीची राह रपटीली, पांव नहीं ठहराय। सोच-सोच पग धरूं जतन से, बार-बार डिग जाय। मीराबाई ने प्रेम और भक्ति की राह को रपटीली कहा था। लेकिन चौमासे में ज्यादातर गांवों के सरकारी स्कूलों की राह भी प्रेममय-भक्तिमय नजर आ रही है। यानी रपटीली। टोंक की निवाई तहसील का छोटा सा गांव है दहलोद। यहां 30 बच्चे रोजाना स्कूल जाने के लिए एक किलोमीटर तक एक से डेढ़ फीट का दरिया पार करते हैं। जूतों से चलने का सवाल ही नहीं। कभी-कभी चप्पल दुहरा जाती है या बद्दी उखड़ जाती है। बच्चे सोच-सोच कर जतन से पग धरते हैं लेकिन डिग जाते हैं। बच्चों को मीराबाई का चैप्टर पढ़ाया जाए तो वे समझ नहीं पाएंगे कि वे भक्ति की राह पर चलती थीं या फिर स्कूल की राह पर। सरकारी स्कूलों के बरामदों में अक्सर लिखा होता है- असतो मा सदगमय..तमसो मा ज्योतिर्गमय। चौमासे-चौमासे यह भी लिख देना चाहिए- कीचड़ मा स्कूल गमय। धौलपुर के सोशल मीडिया इन्फ्लूएंसर अलग तरह की समाजसेवा कर रहे हैं। वे पानी-गड्ढे-कीचड़ वाली खराब सड़कों पर जाते हैं और फिल्मी गीतों पर डांस कर प्रशासन का ध्यान खींचते हैं। खास बात ये मखौल उड़ाए जाने के बाद प्रशासन एक्टिव होता है और सड़क की मरम्मत कर दी जाती है। टोंक के बच्चों को इस वक्त सर से ज्यादा ऐसे ही किसी इन्फ्लूएंसर की जररूत है। इनपुट सहयोग- महावीर बैरवा (टोंक)। वीडियो देखने के लिए सबसे ऊपर फोटो पर क्लिक करें। अब कल सुबह 7 बजे मुलाकात होगी।