राज्य के सबसे बड़े शिक्षा विभाग में 2015 की स्कूल व्याख्याता भर्ती से जुड़े लंबे समय से चल रहे वरिष्ठता विवाद पर राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर खंडपीठ ने बड़ा फैसला सुनाया है। न्यायमूर्ति इन्द्रजीत सिंह और रवि चिरानिया की खंडपीठ ने 8 जुलाई को सुनाए फैसले में राज्य सरकार की ओर से 21 नवंबर 2022 को जारी अंतर वरिष्ठता (इंटर-से सीनियरिटी) सूची को अवैध घोषित करते हुए निरस्त कर दिया है। इसी सूची के आधार पर हुई उप प्रिंसिपल पद की पदोन्नतियां भी रद्द कर दी गई हैं। कोर्ट ने राज्य सरकार को चार माह के भीतर नई वरिष्ठता सूची तैयार कर 2021 सेवा नियमों के तहत पदोन्नति प्रक्रिया दोबारा पूरी करने के निर्देश दिए हैं। इस फैसले का असर टोंक समेत प्रदेशभर के सैकड़ों व्याख्याताओं पर पड़ेगा। संयुक्त मेरिट के आधार पर बनेगी नई सूची अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिए हैं कि 2015 भर्ती के सभी चयनित अभ्यर्थियों की संयुक्त मेरिट के आधार पर नई वरिष्ठता सूची तैयार की जाए। इसके बाद 2021 सेवा नियमों के अनुसार उप प्रिंसिपल सहित उच्च पदों पर पदोन्नति की प्रक्रिया फिर से पूरी की जाए। मेरिट ही होगी वरिष्ठता का आधार हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा कि एक ही विज्ञापन और एक ही चयन प्रक्रिया से चयनित अभ्यर्थियों की वरिष्ठता केवल मेरिट के आधार पर तय होगी। परिणाम घोषित होने या नियुक्ति आदेश अलग-अलग तारीखों पर जारी होने का असर वरिष्ठता पर नहीं पड़ सकता। खंडपीठ ने कहा कि प्रशासनिक सुविधा के नाम पर कम मेरिट वाले अभ्यर्थियों को ज्यादा मेरिट वाले अभ्यर्थियों से वरिष्ठ बनाना संविधान के समान अवसर के सिद्धांत के खिलाफ है। हाईकोर्ट के फैसले की प्रमुख बातें 21 नवंबर 2022 को जारी अंतर वरिष्ठता सूची को निरस्त कर दिया गया है। इसी सूची के आधार पर हुई उप प्रिंसिपल पदोन्नतियां भी रद्द कर दी गई हैं। वर्ष 2015 भर्ती के सभी चयनित अभ्यर्थियों की संयुक्त मेरिट के आधार पर नई वरिष्ठता सूची तैयार की जाएगी। 2021 सेवा नियमों के तहत उप प्रिंसिपल और अन्य उच्च पदों पर नई पदोन्नति की जाएगी। पूरी प्रक्रिया चार माह में पूरी करने के निर्देश दिए गए हैं। 2018 भर्ती का भी दिया हवाला अदालत ने अपने फैसले में कहा कि राज्य सरकार भविष्य में चयन सूची और नियुक्तियां "वन गो" में जारी करने की नीति अपना चुकी है, ताकि वरिष्ठता विवाद पैदा नहीं हों। जब 2018 की भर्ती में यही व्यवस्था लागू की गई थी तो 2015 भर्ती में अलग व्यवस्था अपनाने का कोई औचित्य नहीं था। माना जा रहा है कि इस फैसले का असर प्रदेशभर में बड़ी संख्या में 2015 भर्ती के व्याख्याताओं और इसी वरिष्ठता सूची के आधार पर पदोन्नत हुए उप प्रिंसिपलों पर पड़ेगा। अब शिक्षा विभाग को वरिष्ठता निर्धारण और पदोन्नति की पूरी प्रक्रिया नए सिरे से करनी होगी। रेसटा प्रदेशाध्यक्ष ने जांच की मांग उठाई शिक्षक संघ रेसटा, राजस्थान के प्रदेशाध्यक्ष मोहर सिंह सलावद ने कहा कि शिक्षा विभाग को राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर खंडपीठ के फैसले की पालना सुनिश्चित करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि शिक्षा विभाग द्वारा सत्र 2012-13 की वरिष्ठ अध्यापक से व्याख्याता पदों की पदोन्नति के लिए बनाई गई वरिष्ठता सूची की भी जांच होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि सत्र 2011-12 और 2013-14 से 2025-26 तक की वरिष्ठता सूची में मेरिट तय करने के लिए एक नियम अपनाया गया, जबकि सत्र 2012-13 की वरिष्ठता सूची में अलग नियम लागू किया गया था।