कल आपने पढ़ा कि राजकुमारी मूमल का हाथ थामने की चाह रखने वाले कई राजकुमार आए। लेकिन सभी मूमल के जादुई महल की पहेलियों में उलझ कर वापस लौट चुके थे। पढ़िए आगे की कहानी- मूमल इंतजार में थी उस राजकुमार के जो उसकी खूबसूरती से ज्यादा उसकी पहेलियों की गहराई को समझ सके। अपने मन में वह संकल्प लिए बैठी थी कि लौद्रवा का महल उसी का स्वागत करेगा जो बिना डरे काक महल की पहेलियों को सुलझा पाएगा। हजारों राजकुमारों के असफल होने के बाद, कहानी में प्रवेश हुआ अमरकोट के राणा महेंद्र का। महेंद्र निडर और साहसी योद्धा थे। एक दिन शिकार खेलते हुए वे भटककर काक नदी के तट पर पहुंच गए। वहां उन्होंने मूमल के जादुई महल की चर्चा सुनी। उनके साथियों ने उन्हें चेतावनी दी- राणा वहां जाना अपनी जान और इज्जत को दांव पर लगाना है। वह राजकुमारी सौंदर्य से ज्यादा अपनी पहेलियों के लिए जानी जाती है। राणा महेंद्र ने इस चेतावनी को चुनौती की तरह लिया। उन्होंने अपने ऊंट को एड़ लगाई और महल की ओर बढ़ गए। गहरा और डरावना था काक नदी का पानी चांदनी रात थी और रेगिस्तान की रेत चांदी की तरह चमक रही थी। राणा महेंद्र अपने ऊंट पर सवार काक नदी के किनारे पहुंच गए-ठहरो चीतल ! सामने देखो..वह रहा काक महल। जिसकी चर्चा पूरे राजपूताने में है, महेंद्र के चेहरे पर डर नहीं, एक जिज्ञासु मुस्कान थी। महेंद्र जैसे ही महल की ओर बढ़े, सामने एक विशाल जलाशय दिखाई दिया जिसमें चांद की परछाईं हिल रही थी। पानी गहरा और डरावना लग रहा था। इतना शांत पानी… और लहरें भी नहीं? महेंद्र सोच में पड़ गए। …और टूट गया जादुई महल का तिलस्म महेंद्र ने अपनी तलवार निकाली और पानी की सतह पर मारी। 'खनक' की आवाज आई। वे समझ गए कि यह पानी नहीं, बल्कि चमकाया हुआ पत्थर और कांच है। वे निडर होकर उस पर चल पड़े। मूमल ऊपर से यह सब देख रही थी। वह हैरान थी कि कोई इतनी जल्दी रहस्य समझ गया। महेंद्र महल के गलियारे में पहुंचे। अचानक रास्ते में उन्हें कांटों और झाड़ियों का ढेर दिखाई दिया, जिससे गुजरना असंभव लग रहा था। हवा का झोंका इन कांटों के बीच से होकर आ रहा है, अगर ये असली होते तो हवा रुक जाती, महेंद्र ने मन ही मन समझ बनाई, आंखें बंद कीं और सीधा उन कांटों की तरफ कदम बढ़ा दिए। जैसे ही वे उनसे टकराए, कांटे धुएं की तरह गायब हो गए। वह सिर्फ एक रेशमी परदे का भ्रम था। अपने आप खुल गए दरवाजे अगले कक्ष में उन्हें शेर की दहाड़ सुनाई दी और सैकड़ों परछाइयां उनकी ओर झपटीं। महेंद्र ने तलवार नहीं निकाली, बल्कि अपनी आंखें बंद कर लीं और अपनी अंतरात्मा की आवाज सुनी। उन्होंने महसूस किया कि यह सब हवा और शीशों का खेल है। उनकी इसी बुद्धिमानी और धैर्य को देखकर मूमल बेहद प्रभावित हुई। महेंद्र अंततः मूमल के कक्ष पर पहुंचे। दरवाजे अपने आप खुल गए। सामने मूमल खड़ी थी, जिसके चेहरे पर गर्व और खुशी साफ दिखाई दे रही थी। काक महल के भ्रम को केवल वही पार कर सकता था जिसकी आंखों पर अहंकार की पट्टी न हो। यहां रास्ता वही बना पाता है जो आंखों से नहीं, दिल से देखता है। आपका स्वागत है राणा महेंद्र, मूमल का चेहरा खुशी से चमक उठा। राजकुमारी, आपकी पहेलियां कठिन थीं, लेकिन सत्य हमेशा सीधा होता है। मैं यहां आपकी बुद्धिमानी को नमन करने आया हूं, राणा महेंद्र की नज़र मूमल के चेहरे पर जैसे ठहर गईं। महेंद्र और मूमल एक दूसरे की बुद्धिमत्ता पर मोहित थे। उस रात लौद्रवा की ठंडी रेत ने एक ऐसा मिलन देखा, जो देखते ही देखते अटूट प्रेम में तब्दील हो गया। कहते हैं प्रेम की परीक्षा अक्सर कठिन होती है। इस प्रेम कहानी को भी नियति का सामना करना पड़ा। मूमल -महेंद्र का प्रेम परवान पर था, लेकिन फिर ऐसा क्या हुआ जिसने इस गहरे प्रेम को विरह में बदल दिया? जानिए अगले एपिसोड में….. (कहानी को रोचक बनाने के लिए क्रिएटिव लिबर्टी का इस्तेमाल किया गया है। सोर्स : राजस्थानी साहित्य, लोक कथाएं व स्थानीय लोगों से बातचीत ) ….. राजस्थानी प्रेम कहानी…मूमल-महेंद्र की कहानी का पार्ट-1 रेगिस्तान में काक नदी के किनारे था मूमल का महल:अमरकोट के राजा और जैसलमेर की राजकुमारी का प्रेम; 4 एपिसोड में मूमल-महेंद्र की कहानी जैसलमेर के लौद्रवा की राजकुमारी मूमल और अमरकोट (वर्तमान पाकिस्तान) के राणा महेंद्र की प्रेम कहानी सदियों पुरानी है। इस कहानी को जानने के लिए दैनिक भास्कर जैसलमेर से 14 किलोमीटर दूर लौद्रवा गांव पहुंचा। पूरी स्टोरी पढ़िए…