जयपुर के SMS हॉस्पिटल में कानों की जांच करवाने के बाद यदि आपको किसी दूसरे सरकारी हॉस्पिटल की रिपोर्ट में अंतर मिलता है, तो चौंकिएगा नहीं। यह रिपोर्ट में गड़बड़ी नहीं है, बल्कि प्रदेश में कानों की जांच के लिए लगाई गई मशीनों के पैरामीटर सेट नहीं होने के कारण हो रहा है। इसके चलते आवेदकों की दिव्यांगता की प्रतिशत में भी अंतर दिखाई दे रहा है। कई बार सरकारी भर्ती में सिलेक्ट (चयनित) होने वाले अभ्यर्थियों को भी इस परेशानी से गुजरना पड़ता है। इन दिनों ENT विभाग में ऐसे कई मामले सामने आ रहे हैं। दैनिक भास्कर ने जब इन खामियों की पड़ताल की, तो कई चौंकाने वाली जानकारियां सामने आईं। पढ़िए यह रिपोर्ट… अब 3 मामलों से समझिए पूरा मामला.. पहला मामला: जोधपुर के अस्पताल ने बताया बहरा, जयपुर में रिपोर्ट आई नॉर्मल JEn भर्ती परीक्षा 2025 में 29 साल के एक युवक का चयन हुआ था। सितंबर 2025 में चयन के बाद जोधपुर के मथुरादास माथुर (MDM) अस्पताल में उसकी जांच की गई, जो संदिग्ध पाई गई। इसके बाद 9 फरवरी 2026 को उसका दोबारा BERA टेस्ट करवाया गया, जिसमें 16.5 प्रतिशत बहरापन दर्शाया गया। जब इस पर संदेह हुआ और जयपुर के SMS अस्पताल में जांच करवाई गई, तो वहां रिपोर्ट पूरी तरह नॉर्मल आई। यानी अभ्यर्थी बिल्कुल ठीक था और बहरा नहीं था। दूसरा मामला: हर जांच में बदलता गया बहरापन का प्रतिशत बाड़मेर की युवती ने 42% अस्थायी दिव्यांगता (Temporary Disability) का सर्टिफिकेट बनवाया था, जो 20 दिसंबर 2022 से लेकर 3 साल और 1 महीने के लिए वैध (वेल्डि) था। इस अवधि के दौरान उसका चयन प्राथमिक विद्यालय अध्यापक भर्ती-2022 में हो गया। चयन के बाद जोधपुर में जब उसके बहरापन की जांच की गई, तो वह 27 प्रतिशत निकला। मामला संदिग्ध लगने पर जयपुर के SMS अस्पताल में जांच के लिए एक विशेष कमेटी गठित की गई। इस कमेटी की पहली जांच में बहरापन 13% पाया गया, जबकि दूसरी जांच में यह घटकर 0% (यानी बिल्कुल सामान्य) निकला। तीसरा मामला: RAS अभ्यर्थी की रिपोर्ट में भी आया बड़ा अंतर राजस्थान प्रशासनिक सेवा (RAS) में चयनित एक अभ्यर्थी का 1 मार्च 2025 को जोधपुर के मथुरादास माथुर अस्पताल में BERA टेस्ट हुआ था, जिसमें उसका बहरापन 27.5% पाया गया था। चयन के बाद जब बोर्ड ने जयपुर के SMS अस्पताल में उसकी दोबारा जांच करवाई, तो पहली जांच में बहरापन केवल 13% मिला। दोनों रिपोर्टों में बड़ा अंतर देखकर 17 फरवरी 2026 को फिर से जांच करवाई गई, जिसमें बहरापन 0% (बिल्कुल सामान्य) पाया गया। इसका मतलब यह हुआ कि अभ्यर्थी ने जिस दिव्यांग कैटेगरी (बहरापन) के तहत क्वालीफाई किया था, वहां से वह बाहर (Disqualify) हो गया। हालांकि, हाथ से भी दिव्यांग होने के कारण उसे दूसरी दिव्यांग कैटेगरी के तहत चयन मिल गया। डॉक्टरों को जयपुर बुलाया था इसके अलावा RAS भर्ती परीक्षा 2023 में दिव्यांग श्रेणी में चयनित एक आवेदक की कानों की दिव्यांगता का प्रतिशत जांच चिकित्सा विभाग ने जोधपुर के एमडीएम अस्पताल में करवाई। बाद में जयपुर के SMS हॉस्पिटल में वही जांच करवाने पर अंतर नजर आया। संयुक्त शासन सचिव ने मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल को पत्र लिखकर डॉक्टरों को जयपुर बुलाया, ताकि यह निर्धारित किया जा सके कि कौन सी रिपोर्ट सही है। मशीनों के पैरामीटर में अंतर जयपुर के SMS हॉस्पिटल और जोधपुर के मेडिकल कॉलेज में कानों की जांच के लिए अलग-अलग कंपनियों की मशीनें लगी हैं। मशीनों के पैरामीटर सेट नहीं होने के कारण BERA टेस्ट के परिणाम अलग-अलग आ रहे हैं। कैलकुलेशन में भिन्नता और गाइडलाइन का अभाव BERA रिपोर्ट आने के बाद दिव्यांगता प्रतिशत का कैलकुलेशन डॉक्टर करते हैं। BERA रिपोर्ट DBNHL (डेसिबल नॉर्मलाइज्ड हियरिंग लेवल) में होती है, जिसे गजट के हिसाब से DBHL (डेसिबल हियरिंग लेवल) में कन्वर्ट करके ही दिव्यांगता का कैलकुलेशन किया जाता है। इसकी कोई गाइडलाइन नहीं होने के चलते अलग-अलग मेडिकल कॉलेज में डॉक्टर DBNHL को DBHL में कन्वर्ट करने का करेक्शन फैक्टर अलग-अलग काम में लेते हैं (जैसे कि कोई DBNHL में से 5, तो कोई 15, तो कोई 10 और किसी जगह 0 घटाया जाता है)। इसके कारण एक ही अभ्यर्थी का अलग-अलग जगह BERA रिपोर्ट होने के बाद दिव्यांगता प्रतिशत अलग आता है। सरकार ने आज तक इस बारे में कोई गाइडलाइन नहीं बनाई है, जिससे कई बार आवेदक नौकरी से वंचित रह जाते हैं। ठेके के कर्मचारी करते हैं जांच राजस्थान में सरकारी नौकरियों में फिजिकल डिसेबिलिटी का फायदा लेने वालों के लिए सर्टिफिकेट बनाने के लिए जांचें ठेके के कर्मचारी कर रहे हैं। ये कर्मचारी सरकारी नौकरी लगे अभ्यर्थियों की जांच सहित महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं। RAS, RPS जैसी महत्वपूर्ण भर्तियों के मेडिकल सर्टिफिकेट भी इन्हीं कर्मचारियों की जांच के आधार पर जारी किए जाते है। अहम विभाग (सरकारी मेडिकल बोर्ड और चिकित्सा विभाग) होने के बावजूद ऑडियोलॉजिस्ट और स्पीच थैरेपिस्ट के स्थायी पद भी नहीं हैं। पिछले 50 सालों से ठेके के कर्मचारियों की दी रिपोर्ट के आधार पर राज्य के कर्मचारियों के लिए मेडिकल सर्टिफिकेट जारी किए जा रहे हैं। इससे गड़बड़ियों की आशंका बनी रहती है। एक्सपर्ट ने कहीं ये 3 अहम बातें 1. बेरा टेस्ट (BERA Test) के एकसमान मानक न होने से दिव्यांगता प्रतिशत में भिन्नता: जोधपुर में हियरिंग इफेक्टेड बच्चों के लिए काम करने वाले राम किशोर जाखड़ ने बताया- पूरे प्रदेश में बेरा टेस्ट (Bera Test) के समान मानक तय नहीं होने के कारण अलग-अलग अस्पतालों में विशेषज्ञों द्वारा इसकी अलग-अलग मार्किंग की जाती है, जिससे दिव्यांगता का प्रतिशत भिन्न-भिन्न आता है। जहां एक डॉक्टर इसी जांच में 30% दिव्यांगता (डेसिबल) बताते हैं। वहीं उसी जांच को देखकर दूसरे डॉक्टर 40% से अधिक दिव्यांगता दर्शा देते हैं। पूछने पर वे इसकी अलग-अलग व्याख्या करते हैं। पूरे देश में इस जांच के एकसमान मानक तय होने चाहिए, ताकि जांच की पारदर्शिता बनी रहे। 2. पश्चिमी राजस्थान के एकमात्र MDM अस्पताल में जांच मशीन की कमी: राम किशोर जाखड़ ने बताया- पूरे पश्चिमी राजस्थान के एकमात्र एमडीएम अस्पताल में केवल एक ही बेरा जांच मशीन होने के कारण दूर-दराज से आने वाले दिव्यांगजनों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ता है। समय पर जांच न होने और UDID कार्ड नहीं बनने के कारण वे सरकारी योजनाओं और सहायता से वंचित रह जाते हैं। 3. ग्रामीण क्षेत्रों के दिव्यांगों के UDID कार्ड साल-भर से लंबित: राम किशोर जाखड़ ने बताया- ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले दिव्यांगजनों के UDID कार्ड साल-साल भर से लंबित (पेंडिंग) पड़े हैं। दिव्यांग व्यक्ति CMHO कार्यालय और सरकारी अस्पतालों के बीच चक्कर काटने को मजबूर हैं।