प्रदेश के 1200 से ज्यादा गांवों को प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत पक्की सड़कों से जोड़ना है, लेकिन इन दिनों चल रहे ईरान–अमेरिका युद्ध के कारण ग्रामीणों को और इंतजार करना पड़ सकता है। इसमें सबसे बड़ी वजह डामर के भाव 40 प्रतिशत तक बढ़ना बताया जा रहा है। ऐसे में कई जगह टेंडर होने के बाद भी वर्क ऑर्डर जारी नहीं हो पा रहे हैं । तो कुछ जगह वर्क ऑर्डर जारी होने के बावजूद डामरीकरण नहीं हो पा रहा। ठेकेदार युद्ध खत्म होने के इंतजार में हैं, ताकि डामर के भाव में गिरावट आते ही काम शुरू किया जाए। इस वक्त प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के चौथे चरण का काम जारी है। यह गत वर्ष दिसंबर में शुरू हुआ था और अगले वर्ष तक पूरा होना है। इसके अंतर्गत राजस्थान में 1638 सड़कों का निर्माण करवाकर गांव ढाणियों को जोड़ा जाना है। इस पर 2082 करोड़ रुपए खर्च किए जाएंगे। प्रदेश में यह काम दो चरणों में होगा। पहले चरण में 1216 सड़कों को स्वीकृति दी गई है। शेष दूसरे चरण में शामिल की जाएंगी। इससे प्रदेश की हजारों ढाणियों और गांवों को ऑलवेदर पक्की सड़कों से जोड़ा जाएगा। प्रथम फेज की 1216 सड़कों के निर्माण के लिए 2082 करोड़ से ज्यादा रुपए स्वीकृत किए गए हैं। इस फेज में 3219 किलोमीटर लंबी सड़कों का जाल बिछाया जाएगा। जबकि इन सड़कों के रखरखाव के लिए अलग से 114 करोड़ से ज्यादा रुपए का प्रावधान किया गया है।सबसे ज्यादा बाड़मेर क्षेत्र में 748 किमी लंबी सड़कें बनेंगी। वहीं, बालोतरा में 487 किमी, फलोदी में 384 किमी, जोधपुर में 276 किमी, बीकानेर में 213 किमी, उदयपुर में 171 किमी, सिरोही में 147 किमी, जैसलमेर में 94 किमी, बांसवाड़ा में 90 किमी, डूंगरपुर में 83 किमी, सलूम्बर में 76 किमी, बारां में 36 किमी, पाली में 31 किमी, जालोर में 285 किमी, सीकर में 16 किमी, डीडवाना-कुचामन में 16 किमी, नागौर में 8 किमी, अजमेर में 7 किमी, भीलवाड़ा में 5 किमी, ब्यावर 5 किमी, जयपुर में 5 किमी, हनुमानगढ़ में 2 किमी, अलवर में 2 किमी, श्रीगंगानगर में 3 किमी व राजसमंद में 1 किमी सड़क बनाई जाएगी। वहीं, प्रतापगढ़ जिले में 17 किमी सड़क के साथ 100 मीटर लंबे ब्रिज का भी निर्माण कराया जाएगा। 55-60% डामर देश में बन रहा, बाकी का आयात युद्ध के कारण देश में डीजल पेट्रोल के भाव तो नहीं बढ़े लेकिन डामर महंगा हो गया है। 55–60 प्रतिशत डामर देश में बन रहा है लेकिन बाकी का आयात कराना पड़ रहा। ठेकेदार एसोसिएशन के संभागीय अध्यक्ष महेंद्रसिंह ने बताया कि युद्ध से पहले डामर 50 हजार प्रति टन मिल रहा था। अब इसके भाव 80 हजार से ऊपर जा चुके हैं। जिनके पास डामर स्टॉक था, वे काम कर रहे होंगे। स्थिति में सुधार होने पर रेट कम होगी तो काम की रफ्तार भी तेज होगी।