जवाई कंजर्वेशन क्षेत्र के नाजुक इको सिस्टम को बचाने के लिए हाईकोर्ट के निर्देशों पर तैयार नई व्यवस्था अब लागू होने जा रही है। इस सिस्टम के तहत सफारी संचालन पर कड़ी निगरानी रखी जाएगी। सबसे अहम बदलाव यह है कि अब सभी सफारी वाहनों में जीपीएस लगाना अनिवार्य कर दिया गया है और इसकी मॉनिटरिंग के लिए बाहरी एजेंसी नियुक्त की जाएगी, ताकि डेटा से किसी भी तरह की छेड़छाड़ न हो सके। बेहतर निगरानी के लिए पूरे जवाई क्षेत्र को चार क्लस्टर में बांटा गया है, जिनमें अलग-अलग गांवों और संवेदनशील इलाकों को शामिल किया गया है। कलेक्टर की अध्यक्षता में जवाई सफारी एंड इको-टूरिज्म कोऑर्डिनेशन कमेटी बनाई गई है, जो इन नियमों को सख्ती से लागू करवाएगी। वन्यजीव संरक्षण अधिनियम की धारा 9 के तहत अब नाइट सफारी, बैटिंग (मांस डालना), चारा डालना, ड्रोन उड़ाना और जीपीएस से छेड़छाड़ करना गंभीर उल्लंघन माना जाएगा। ऐसा करने पर वाहन को मौके पर ही रोका जा सकता है, उसे ब्लैकलिस्ट किया जा सकता है और जहां एक्ट लागू नहीं होता वहां 25 हजार रुपए तक का जुर्माना लगाया जाएगा। एसओपी की आधिकारिक अधिसूचना के बाद 60 दिन का ट्रांजिशन पीरियड दिया जाएगा। इस दौरान सभी सफारी गाड़ियों का रजिस्ट्रेशन, जीपीएस इंस्टॉलेशन और ड्राइवर व रिसॉर्ट संचालकों से लिखित शपथ पत्र लिए जाएंगे। इसके बाद समझाइश का दौर खत्म कर चरणबद्ध तरीके से पूरी एसओपी सख्ती से लागू की जाएगी। यह एसओपी डीसीएफ कस्तूरी प्रशांत सुले और एसीएफ साहिल पोसवाल द्वारा तैयार की गई है, जिसमें सीसीएफ अनूप केआर की भी अहम भूमिका रही है। नक्शे में जंगल नहीं, इसलिए मिलती रही मंजूरी; जमीन पर गुफाएं थीं, इसलिए पैंथर भाग गए जवाई की अधिकांश पहाड़ियां सरकारी रिकॉर्ड में राजस्व भूमि दर्ज हैं। यही वो लूपहोल है, जिसने पूरा खेल बदल दिया। वन विभाग केवल फॉरेस्ट बाउंड्री देखता रहा। नक्शे पर जहां जंगल नहीं, वहां खतरा भी नहीं माना गया और इसी आधार पर ‘मैकेनिकल एनओसी’ जारी होती रही। जमीन पर क्या है? लेपर्ड की गुफा, ब्रीडिंग साइट या कॉरिडोर, यह जांच का हिस्सा ही नहीं था। बाली क्षेत्र के कोठार गांव में यह विरोधाभास साफ दिखता है। एक खसरा पर रिसॉर्ट का निर्माण हुआ। ठीक नीचे पहाड़ी, जहां लेपर्ड की सक्रिय गुफाएं हैं। याचिका के अनुसार यहां 4-5 शावकों के साथ लेपर्ड रह रहे थे। निर्माण शुरू हुआ। आवाजाही बढ़ी और अब डेन अबंडनमेंट (मांद छोड़ना) के संकेत मिल रहे हैं। स्थानीय गाइड बताते हैं कि पहले यहां रोज साइटिंग होती थी। जवाई में पर्यटन धीरे-धीरे इको-टूरिज्म से शो-टूरिज्म में बदल गया। सीजन में 300 से ज्यादा जिप्सियां, लेपर्ड को पास लाने के लिए मांस डालना (बैटिंग), रात में फ्लैशलाइट के साथ नाइट सफारी, गुफाओं के बाहर भीड़ और शोर होता रहा।