युगप्रधान आचार्य महाश्रमण ने कहा कि सद्भाव प्रत्याख्यान साधना का शिखर है। इसके जरिए जीव अनिवृत्ति को पा सकता है। राग-द्वेष से मुक्ति के बिना मोक्ष संभव नहीं है। व्यक्ति को जीवन में संयम, त्याग, आध्यात्मिक साधना को महत्व देना चाहिए। धर्मा सभा के मुख्य मंगल प्रवचन में उन्होंने आगम के माध्यम से सद्भाव प्रत्याख्यान से क्या मिलेगा विषय पर श्रद्धालुओं को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि धार्मिक जीवन में प्रत्याख्यान यानी त्याग का विशेष महत्व है। मन, वचन, काया से शुभ प्रवृत्तियां होने पर पापकर्मों का क्षय होता है। पुण्यकर्मों का बंध भी होता है। आचार्य महाश्रमण ने कहा कि सद्भाव प्रत्याख्यान ऐसा प्रत्याख्यान है, जिसके बाद कोई आश्रव प्रत्याख्यान शेष नहीं रहता। यह सभी प्रत्याख्यानों में श्रेष्ठ है। यह साधना का शिखर है। जब तक व्यक्ति की प्रवृत्तियां जारी रहती हैं, तब तक साधना की सर्वोच्च अवस्था नहीं मिलती। राग-द्वेष, कषायों से मुक्त व्यक्ति ही मोक्ष की दिशा में आगे बढ़ सकता है। उन्होंने सघन साधना शिविर के महत्व पर कहा कि इस वर्ष दूसरी बार शिविर का आयोजन हो रहा है। साधना से भीतर मुमुक्षा यानी मुक्ति पाने की भावना जाग जाए तो प्रयास सार्थक हो सकता है। मुमुक्षा जागृत नहीं होने पर भी शिविर से संयम, साधना का अभ्यास करने का अवसर मिलता है। शिविर में छोटे बच्चों की सहभागिता को उन्होंने सराहा। शिविरार्थियों से कहा कि संयम की साधना का अभ्यास करने का प्रयास करें। मंगल प्रवचन से पहले शारदीय नवरात्र पर आध्यात्मिक अनुष्ठान के तहत मंत्र जप हुआ। आचार्य महाश्रमण के निर्धारित मंत्रों के उच्चारण के साथ चतुर्विध धर्मसंघ ने भी अनुष्ठान में सहभागिता निभाई। उनकी मंगल सन्निधि में आध्यात्मिक गतिविधियां जारी हैं। बड़ी संख्या में श्रद्धालु प्रवचनों से प्रेरणा ले रहे हैं। प्रवचन के बाद आचार्य महाश्रमण ने सघन साधना शिविर के संभागियों को जिज्ञासाएं रखने का अवसर दिया।