गिरते भू-जल स्तर और मिट्टी के तेजी से हो रहे कटाव को रोकने के लिए शेरगढ़ अभयारण्य में वन विभाग ने एक बड़ा संरक्षण अभियान चलाया है। वर्ष 2025-26 में लगभग 47 लाख रुपए की लागत से 115 मृदा एवं जल संरक्षण संरचनाएं तैयार की गई हैं। इन संरचनाओं से इस मानसून में लगभग 1000 करोड़ लीटर वर्षा जल का संग्रह होगा। साथ ही, 40 हजार टन उपजाऊ मिट्टी के बहाव को भी रोका जा सकेगा। इससे भू-जल रिचार्ज बढ़ने के साथ वन्यजीवों के लिए सालभर पानी की उपलब्धता बेहतर होगी। शेरगढ़ अभयारण्य के रेंजर जितेंद्र खटीक ने बताया कि जल संरक्षण और मृदा संरक्षण के ये कार्य कैंपा फंड, आरएपीडीपी सहित विभिन्न मदों से कराए गए हैं। अभयारण्य में 2000 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में ग्रास लैंड भी विकसित किए गए हैं। घास प्राकृतिक स्पंज की तरह कार्य करती है, जो मिट्टी और पानी को बांधकर वर्षा जल के तेज बहाव को नियंत्रित करती है। चरागाहों में गिरने वाले वर्षा जल का 30 से 42 प्रतिशत हिस्सा घास अवशोषित कर लेती है, जबकि घने वृक्ष केवल 18 से 22 प्रतिशत तक ही पानी सोख पाते हैं। इससे प्रति हेक्टेयर करीब 3.6 टन मिट्टी के बहाव को रोका जा सकेगा। एसीएफ अनुराग भटनागर ने जानकारी दी कि शेरगढ़ अभयारण्य में औसतन 600 मिमी बारिश होती है, जिससे करीब 6000 करोड़ लीटर पानी गिरता है। नई संरचनाओं के माध्यम से लगभग 1000 करोड़ लीटर पानी सहेजने की क्षमता विकसित की गई है। जमीन की सबसे उपजाऊ ऊपरी परत (टॉप सॉयल) में कैल्शियम, आयरन, मैग्नीशियम और अन्य आवश्यक पोषक तत्व होते हैं। तेज बारिश में यही मिट्टी बहकर नदियों और समुद्र तक पहुंच जाती है, जिससे खेतों की उर्वरता घटती है और नदियों, बांधों व जलाशयों में गाद भरने से उनकी जल संग्रहण क्षमता भी कम हो जाती है। वन विभाग के अनुसार यह अभियान इसलिए भी अहम है क्योंकि भू-जल का दोहन रिचार्ज की तुलना में 180 प्रतिशत से अधिक हो चुका है। हर वर्ष भू-जल स्तर 0.3 से 2.88 मीटर तक नीचे जा रहा है, जबकि वर्षा के रूप में मिलने वाले मीठे पानी का केवल 15 प्रतिशत ही उपयोग हो पाता है और शेष 85 प्रतिशत पानी बहकर समुद्र में चला जाता है। ऐसे में शेरगढ़ अभयारण्य में तैयार की गई ये संरचनाएं न केवल जल संरक्षण बल्कि मिट्टी, वन और वन्यजीवों के संरक्षण की दिशा में भी महत्वपूर्ण साबित होंगी।