सिरोही जिले के सरकारी विद्यालयों में कार्यरत व्यावसायिक प्रशिक्षकों को 3 महीने से मानदेय नहीं मिला है। इसके कारण उनकी आर्थिक और मानसिक स्थिति प्रभावित हो रही है। प्रशिक्षकों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द भुगतान नहीं हुआ तो वे कार्य बहिष्कार और आंदोलन करेंगे। मानदेय न मिलने से विद्यार्थियों की व्यावसायिक शिक्षा भी बाधित हो रही है। केंद्र सरकार की व्यावसायिक शिक्षा योजना के तहत इन प्रशिक्षकों को सरकारी विद्यालयों में नियुक्त किया गया है। गुरुग्राम स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ स्किल डेवलपमेंट (IISD) के माध्यम से इनका प्रशिक्षण कार्य संचालित होता है। प्रशिक्षकों का आरोप है कि संबंधित एजेंसी समय पर भुगतान नहीं कर रही है, जिससे वे 3 महीने से मानदेय से वंचित हैं। मानसिक और आर्थिक रूप से परेशान वरिष्ठ कर्मचारी नेता गोपाल सिंह राव पोसालिया ने बताया कि प्रशिक्षक नियमित रूप से विद्यालयों में अपनी सेवाएं दे रहे हैं, लेकिन उन्हें केवल आश्वासन मिल रहा है। उन्होंने कहा कि इससे प्रशिक्षक और उनके परिवार मानसिक व आर्थिक रूप से परेशान हैं। राव ने यह भी बताया कि जिला कार्यालय ने सभी भुगतान संबंधी पत्रावलियां समय पर भेज दी हैं और जिले में व्यावसायिक शिक्षा के लिए बजट भी उपलब्ध है। इसके बावजूद, एजेंसी भुगतान रोक रही है और फाइल जमा नहीं करवा रही है। शर्त का उल्लंघन कर रही है कंपनी राव के अनुसार, राजस्थान स्कूल शिक्षा परिषद (जयपुर) द्वारा वर्ष 2022 में जारी टेंडर के बिंदु संख्या 04 में 3 महीने का अग्रिम वेतन देने का स्पष्ट प्रावधान था। प्रशिक्षकों का आरोप है कि कंपनी इस शर्त का उल्लंघन कर रही है और नियमों को दरकिनार कर काम कर रही है। प्रशिक्षकों में इस बात को लेकर भी रोष है कि संबंधित एजेंसी के खिलाफ अभी तक किसी अधिकारी द्वारा कोई सख्त कार्रवाई या दबाव नहीं बनाया गया है। प्रशिक्षकों ने जिला प्रशासन, शिक्षा विभाग और समग्र शिक्षा अभियान (समसा) के अधिकारियों से इस मामले में तत्काल हस्तक्षेप करने और उनके मानदेय का भुगतान सुनिश्चित करने की मांग की है। आंदोलन की दी चेतावनी उनकी मांग है कि या तो संबंधित एजेंसी को कड़ी कार्रवाई के साथ ब्लैकलिस्ट किया जाए या दबाव बनाकर रोका हुआ मानदेय तुरंत जारी करवाया जाए ताकि वे सुचारू रूप से शिक्षण कार्य कर सकें। प्रशिक्षकों ने चेतावनी दी है कि भुगतान नहीं होने की स्थिति में वे कार्य बहिष्कार और बड़े आंदोलन को मजबूर होंगे, जिससे विद्यार्थी और स्कूलों को और अधिक नुकसान होगा।