4 हजार साल पुरानी सभ्यता के प्रमुख स्थल आयड़ के इस प्राचीन विष्णु मंदिर या मीरा मंदिर की दीवारें रामायण बांच रही हैं। 10वीं शताब्दी के एक चौकोर शिल्प मानो पत्थर नहीं, कथा की सांस, सुंदरकांड की धड़कन और निरंतर विस्तार जैसा है। इसमें हनुमानजी 4 रूपों में एक साथ प्रवाहित हैं। अमूमन प्रतिमाएं दृश्य विशेष तक सीमित रहती हैं, यहां पूरी कथा एक ही फ्रेम में है। इसमें पवनपुत्र न सिर्फ अशोक वाटिका में करुणा बनकर उतरते हैं, बल्कि विनम्रता और पूंछ जलाए जाने पर लंका दहन का अतुलित शौर्य तक दर्शाते हैं। गुहिल शासकों के वैभव, दूर देशों से आते व्यापारियों और समृद्धि के उस युग में भी यह शिल्प कहता है- लोक की असली धरोहर आस्था है, जहां अंजनीपुत्र हर युग में जीवित-जाग्रत हैं। इसमें सीता की खोज से लेकर लंका दहन तक पूंछ बढ़ाइ बांधि बहु भांती। तेहि अवसर लंक जरी सब कांती॥ अर्थात : हनुमानजी की पूंछ कपड़ों से लपेटकर आग लगा दी। यही लंका दहन का कारण बना। अक्षयकुमार मारि संहारा। लागे बंधन करि बहु द्वारा॥ अर्थात : अक्षयकुमार के मारे जाने के बाद राक्षसों ने हनुमानजी को बांध लिया। राम दूत मैं मातु जानकी। सत्य सपथ करुनानिधान की॥ अर्थात : हे माता जानकी! मैं श्रीराम का दूत हूं, यह मैं सत्य शपथ लेकर कहता हूं। देखि सीय सोक बस कृश देही। जटा एक बिनु बेष अति नेही॥ अर्थात : हनुमानजी ने मां सीता को शोक से अत्यंत दुर्बल और विरक्त अवस्था में देखा। भास्कर एक्सपर्ट- डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू , इतिहासकार क्यों खास यह मूर्ति... दसवीं शताब्दी में किसी शिल्पकार द्वारा वाल्मीकि रामायण के दर्जनों श्लोकों और सुंदरकांड की विस्तृत कथा को एक ही पत्थर के टुकड़े पर सीमित कर देना किसी सामान्य कलाकार के वश की बात नहीं रही होगी। यह बहुआयामी मूर्ति प्रयोग का भारत में संभवतः अपनी तरह का पहला और अनूठा उदाहरण है। यह मंदिर न केवल विष्णु पुराण और भागवत के प्रसंगों को संजोए हुए है, बल्कि इसकी उत्तरी भित्ति पर लगा यह पैनल हमारी प्राचीन गुहिल कला और वाल्मीकि रामायण के प्रति तत्कालीन समाज की गहरी आस्था का जीवंत प्रमाण है। देश में ऐसा दूसरा उदाहरण नहीं है।