कुशल कल्पतरू वर्षावास की व्याख्यान माला के क्रम में खरतरगच्छाचार्य जिन मनोज्ञ सूरीश्वर महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए आत्मा का आहार विषय पर सारगर्भित व्याख्यान दिया। उन्होंने कहा कि जिस तरह शरीर के लिए भोजन जरूरी है, उसी तरह आत्मा को भी आहार की दरकार होती है। शरीर भोजन से पोषित होता है। जबकि आत्मा ज्ञान, विवेक, जयणा और स्वाध्याय जैसे सात्विक आहार से पुष्ट होती है। आत्मा को सर्वप्रथम ज्ञान की आवश्यकता होती है। जिससे क्या करने योग्य है और क्या नहीं, इसका विवेक जागृत होता है। आचार्य ने कहा कि ज्ञान प्राप्ति के लिए स्वाध्याय जरूरी है और जयणा का अर्थ हर पल आत्म कल्याण के प्रति जागृत रहना है। जयणा के पालन से पाप कर्मों के विशाल समूह से सहज ही मुक्ति मिल जाती है। आचार्य ने कहा कि शरीर को प्रतिदिन भोजन कराने के बाद भी यह काया अंततः मिट्टी में मिलनी तय है। लेकिन आत्मा शाश्वत है। इसका न आदि है और न अंत। परमात्मा महावीर ने जीव मात्र की आत्मा को एक समान बताया है। शरीर के आकार से आत्मा का आकार तय नहीं होता, इसलिए श्रावक श्राविकाओं के मन में किसी भी जीव को कष्ट पहुंचाने का विचार तक नहीं आना चाहिए। साध्वी हेमरत्ना, साध्वी जयरत्ना एवं साध्वी नूतन प्रिया महाराज ने भजनों की प्रस्तुति देकर आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त किया। दादा जिन कुशल सूरि ट्रस्ट ब्रह्मसर एवं एजी देवी मगराज छाजेड़ उपधान तप समिति के सदस्यों सहित बड़ी संख्या में उपस्थित श्रद्धालुओं ने गुरुवंदन कर मांगलिक पाठ का श्रवण किया।