सरकार प्रदेश में ‘वन स्टेट वन इलेक्शन’ के निर्णय पर कायम है। नवंबर-दिसंबर में पंचायत और निकाय चुनाव से इसकी शुरुआत होगी। यही वजह है कि ओबीसी प्रतिनिधित्व आयोग का कार्यकाल 30 सितंबर तक बढ़ाया गया है। अब सरकार चुनाव आगे बढ़ाने के लिए सुप्रीम कोर्ट जाएगी। तर्क दिया जाएगा कि ओबीसी प्रतिनिधित्व आयोग की रिपोर्ट तैयार नहीं है। चुनाव के लिए और समय दिया जाए। हाईकोर्ट ने 14 नवंबर 2025 को 439 याचिकाओं पर फैसला सुनाते हुए 15 अप्रैल 2026 तक पंचायत और निकाय चुनाव कराने के निर्देश दिए थे। सुप्रीम कोर्ट ने भी हाई कोर्ट का फैसला बरकरार रखा था। निर्वाचन आयोग के आयुक्त राजेश्वर सिंह ने हाल ही में कहा था कि महिला, ओबीसी आरक्षण और एससी-एसटी आरक्षण का निर्धारण पंचायती राज विभाग का कार्य है। इनके बिना चुनाव कैसे कराए जा सकते हैं? उन्होंने समय पर चुनाव नहीं होने की जिम्मेदारी संबंधित विभाग पर डाली थी। ओबीसी आयोग को जल्दबाजी नहीं करने देगी सरकार सरकार नहीं चाहती कि ओबीसी आयोग रिपोर्ट तैयार करने में जल्दबाजी करे। आयोग का कार्यकाल शुरुआत में तीन माह था। पहला विस्तार भी तीन माह का दिया गया। इसके बाद समय अवधि बढ़ती रही और 30 मार्च को तीसरी बार छह माह का सबसे बड़ा विस्तार देते हुए कार्यकाल 30 सितंबर तक कर दिया गया। गौरतलब है कि आयोग ने आंकड़ों में कुछ त्रुटियां बताई थीं और इस संबंध में मुख्य सचिव को पत्र लिखा था। ऐसे में सरकार ने आयोग को पर्याप्त समय देते हुए ‘वन स्टेट वन इलेक्शन’ की तैयारी के लिए भी समय हासिल किया है। 15 तक चुनाव होने थे ग्राम पंचायतें - 14,403 पंचायत समितियां - 457 जिला परिषद - 41 नगर निगम - 10 नगर परिषद - 45 नगर पालिकाएं - 254 अभी तय समय में चुनाव कराना असंभव जैसा ही है क्या अब तय समय में चुनाव संभव हैं? कोर्ट की तय समय-सीमा पूरी होने में सिर्फ कुछ दिन हैं। ऐसे में चुनाव कराना असंभव जैसा ही है। समय पर चुनाव नहीं हुए तो जिम्मेदार कौन ? कानूनी रूप से जिम्मेदारी उस संस्था की होती है, जिसे कोर्ट नोटिस देता है। नोटिस राज्य निर्वाचन आयोग को है। इसलिए पर जिम्मेदारी उसी की होगी। आरक्षण तय नहीं हैं, चुनाव कैसे होंगे? चुनाव आयोग की जिम्मेदारी है, चाहे परिस्थितियां कठिन ही क्यों न हों? नई आरक्षण सूची नहीं मिलती, तो पुराने आंकड़ों पर भी चुनाव संभव हैं। क्या पहले भी ऐसी स्थिति आई है? हां, पहले भी ऐसी स्थिति बन चुकी है। तारीखें घोषित कर दी गई थीं। बाद में स्थगित करना पड़ा था। -भास्कर एक्सपर्ट - मधुकर गुप्ता, पूर्व निर्वाचन आयुक्त