प्रदेश की 9 प्रमुख अकादमियों पर दो साल से सियासी और प्रशासनिक ग्रहण लगा हुआ है। साहित्य, संगीत, ललित कला और क्षेत्रीय भाषाओं (राजस्थानी, संस्कृत, उर्दू, सिंधी, पंजाबी, ब्रज) की तमाम अकादमियां दो साल से अध्यक्ष विहीन और वेंटिलेटर पर हैं। राजस्थान देश का पहला ऐसा राज्य है, जहां सभी भाषाओं के प्रोत्साहन और संवर्धन के लिए अकादमियां बनी हुई हैं। नई सरकार आने के बाद 18 से 30 महीने अध्यक्ष ढूंढने में निकल जाते हैं। उदयपुर स्थित राजस्थान साहित्य अकादमी के कुल 68 साल के सफर में 32% समय (लगभग 22 साल) निर्वाचित अध्यक्ष के बजाय प्रशासकों (आईएएस) के नीरस शासन में बीता है। पिछले दो साल से फिर मीरा पुरस्कार सहित 8 मुख्य श्रेणियों के कुल 40 पुरस्कार लंबित हैं। प्रदेश के 500 से ज्यादा लेखक और कलाकार अपने हक के सम्मान के लिए सचिवालय की ओर टकटकी लगाए बैठे हैं। जूरी गठन की फाइलें 180 दिनों से विभागों के बीच धूल फांक रही हैं, क्योंकि एडिशनल चार्ज पर चल रहे। पुरस्कार-सम्मान की प्रक्रिया से बचते हैं प्रशासक जब अध्यक्ष नहीं होता तो अकादमी का संचालन नियम 11 के तहत सरकार से नियुक्त प्रशासक करता है। प्रशासक के पास वित्तीय व प्रशासनिक शक्तियां होती हैं और वह अध्यक्ष वाले सभी काम कर सकता है। लेकिन पुरस्कार-सम्मान की पेचीदा प्रक्रिया के कारण प्रशासक इन कार्यों से अधिकारी हमेशा बचते रहे हैं। सरकारों को पुरानी परिपाटी तोड़ते हुए कला-साहित्य के संरक्षण के लिए 1 से 6 माह के भीतर अध्यक्षों की नियुक्ति प्रक्रिया पूरी करने का नया ट्रेंड शुरू करना होगा। सवाल... 60% बढ़ जाता है खर्च, इसलिए तो नहीं रोकते नियुक्ति ये अकादमियां भी उपेक्षित, जानिए इनके काम इन महत्वपूर्ण संस्थानों में भी सरकार करती है नियुक्तियां