उदयपुर भाजपा में पिछले एक साल से सुलग रही आंतरिक खींचतान सोमवार को प्रदेशाध्यक्ष मदन राठौड़ के दौरे के दौरान सार्वजनिक हो गई। मेवाड़ की सियासी नब्ज टटोलने पहुंचे राठौड़ के स्वागत में सांगठनिक एकजुटता के बजाय गुटबाजी के स्पष्ट संकेत मिले। महाकालेश्वर मंदिर में जलाभिषेक के दौरान शहर जिलाध्यक्ष गजपाल सिंह राठौड़ और सांसद मन्नालाल रावत तो मौजूद रहे, लेकिन शहर विधायक ताराचंद जैन समेत शहर भाजपा का वह बड़ा धड़ा, जो दशकों तक शहर विधायक रहे पंजाब के मौजूदा राज्यपाल गुलाबचंद कटारिया के नेतृत्व में सक्रिय रहा, कार्यक्रमों से पूरी तरह नदारद दिखाई दिया। यह स्थिति पिछले साल जनवरी में जिलाध्यक्ष पद पर गजपाल सिंह राठौड़ की नियुक्ति के बाद से पनपे असंतोष का परिणाम मानी जा रही है। सोमवार रात 9 बजे तक उदयपुर फाइल्स कांड और नई कार्यकारिणी में अनदेखी को लेकर एक गुट की ओर से प्रदेशाध्यक्ष राठौड़ को ज्ञापन सौंपे जाने की चर्चाओं ने शहर की सियासी सरगर्मी तेज कर दी है। इससे स्पष्ट हो गया है कि संगठन के भीतर समन्वय की कमी है। अंदर की खबर : नियुक्तियों में क्लीन स्वीप और पावर गेम उदयपुर भाजपा में मौजूदा गतिरोध की पटकथा जनवरी-2025 में ही लिख दी गई थी। इसके पीछे दो कारण सामने आ रहे हैं। पहला है- अतुल चंडालिया का नाम कटना। जिलाध्यक्ष पद के लिए राज्यपाल कटारिया के समधी चंडालिया को सबसे प्रबल दावेदार माना जा रहा था। स्थानीय कार्यकर्ताओं को उम्मीद थी कि पुराना शक्ति केंद्र बरकरार रहेगा, लेकिन हाईकमान ने गजपाल सिंह राठौड़ के नाम पर मुहर लगा दी। दूसरी वजह कार्यकारिणी से पुराने चेहरों की विदाई है। गजपाल सिंह ने कमान संभालते ही अपनी जो नई टीम घोषित की, उसमें कटारिया समर्थकों को जगह नहीं मिली। इस रणनीतिक बदलाव ने संगठन को दो फाड़ कर दिया। अब स्थिति ये है कि एक तरफ जिलाध्यक्ष अपना नया आधार तैयार कर रहे हैं तो दूसरी तरफ पुराना कैडर अपनी अनदेखी के विरोध में लामबंद है। उदयपुर फाइल्स - पुलिस की कार्रवाई और संगठन की साख इसी साल 11 फरवरी को अधिवक्ता विशाल गुर्जर के घर हुई पुलिस कार्रवाई ने इस खींचतान को और हवा दी है। एक महिला नेत्री की शिकायत पर हुई इस कार्रवाई के सीसीटीवी फुटेज में पुलिस के साथ कुछ चेहरों की मौजूदगी ने सवाल खड़े किए। नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली ने इसे विधानसभा में उठाया। कटारिया समर्थक गुट का सवाल है कि जब पुलिस चार्जशीट में पार्टी की एक महिला नेत्री का नाम आ चुका है तो कार्रवाई क्यों नहीं हो रही? वहीं दूसरा पक्ष इसे विरोधियों की साजिश करार दे रहा है। आगे : इन 2 बड़े नुकसान के आसार 1. कार्यकर्ताओं का बिखराव - वरिष्ठ पदाधिकारियों व पार्षदों की कार्यक्रमों से दूरी बताती है कि कार्यकर्ताओं का एक बड़ा वर्ग वर्तमान नेतृत्व के साथ सहज नहीं है। कार्यकर्ताओं में यहां तक चर्चा है कि वे किसकी मानें? जो अभी पद पर हैं, उनकी या जो बरसों से सक्रिय रहे हैं, उनकी? 2. निकाय चुनाव - प्रदेश नेतृत्व ने समय रहते समन्वय स्थापित नहीं किया तो आगामी निकाय चुनावों में यह आंतरिक असंतोष पार्टी के प्रदर्शन को प्रभावित कर सकता है। प्रदेशाध्यक्ष को सौंपे गए फीडबैक और ज्ञापनों ने अब गेंद जयपुर और दिल्ली के पाले में डाल दी है।