जिन अंगुलियों को थामकर हमने प‌हला कदम बढ़ाया, आज वे ही हाथ अपनों के साथ को तरस रहे हैं। एकल परिवारों के बढ़ते चलन और भाग-दौड़ भरी जिंदगी ने दादा-दादी, नाना-नानी को बंद कमरे में धकेल दिया है, जहां डिप्रेशन और डिमेंशिया उन्हें खोखला कर रहा है। मनोचिकित्सा केंद्र, जयपुर के अधीक्षक डॉ. ललित बत्रा ने बताया कि आजादी के समय औसत आयु 55 वर्ष थी, अब 70 के करीब है। रोज करीब 50 बुजुर्ग मानसिक अवसाद के अस्पताल पहुंच रहे हैं। मानसिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता भूपेश दीक्षित ने बताया कि ‘क्राइम इन राजस्थान’ रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2021 से 2025 के बीच, राजस्थान में 60 से अधिक आयु के 800 से अधिक बुजुर्गों ने आत्महत्या कर अपना जीवन खोया है। ओपीडी में रोज आ रहे 50 बुजुर्ग, ‘रामाश्रय’ बना सहारा बुजुर्गों की इस पीड़ा को देखते हुए जयपुर के मनोचिकित्सा केंद्र में विशेष जेरियाट्रिक वार्ड ‘रामाश्रय’ बनाया गया है। इसमें हफ्ते में दो दिन (गुरुवार और शुक्रवार) वृद्धजन मनोचिकित्सक द्वारा सेवाएं दी जाती हैं। बुजुर्गों को भर्ती करने के लिए 15 बेड का वार्ड (10 पुरुष और 5 महिला) हैं। बुजुर्गों को सबसे ज्यादा घेर रही हैं ये 4 बीमारियां डॉ. बत्रा के अनुसार, बढ़ती उम्र और ब्रेन की कोशिकाओं (सेल्स) के डीजनरेशन के कारण बुजुर्गों को डिमेंशिया, ओल्ड एज डिप्रेशन, ऑर्गेनिक ब्रेन सिंड्रोम, सिजोफ्रेनिया व उन्माद जैसी समस्या देखने को मिल रही है। लक्षण- याददाश्त खत्म होने लगती है। पहले छोटी बातें भूलना, फिर समय-जगह, यह तक भूल जाते हैं कि खाना खाया है या नहीं। वास्तविकता और कल्पना के बीच अंतर नहीं कर पाते। ऐसे रखें ख्याल... बुजुर्गों को खाली न बैठने दें। नियमित अखबार पढ़ाएं। पजल सॉल्व करवाएं। पसंदीदा प्रोग्राम दिखाएं। बातचीत करें। उनके चिड़चिड़ेपन पर गुस्सा करने के बजाय, यह समझें कि यह उनकी बीमारी का हिस्सा है।