उदयपुर के टीआरआई सभागार में जनजातीय क्षेत्र के विकास को लेकर एक महत्वपूर्ण कार्यशाला आयोजित हुई। इस वर्कशॉप का मुख्य मकसद आदिवासी इलाकों में काम कर रही सरकारी इकाइयों (इंटीग्रेटेड ट्राईबल डवलपमेंट एजेंसी) को और ज्यादा मजबूत और पावरफुल बनाना है। भारत सरकार का जनजातीय कार्य मंत्रालय अब सीधे फील्ड से फीडबैक लेकर योजनाओं में बदलाव की तैयारी कर रहा है, ताकि विकास का लाभ सीधे आम आदमी तक पहुंच सके। यह कार्यशाला बुधवार को हुई। इसमें दिल्ली से आई जनजातीय कार्य मंत्रालय की निदेशक डॉ. वरनाली डेका ने बेहद सरल अंदाज में अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि आदिवासियों के कल्याण के लिए जितनी भी योजनाएं बनती हैं, उन्हें जमीन पर उतारने की असली जिम्मेदारी जिला इकाइयों की होती है। इसीलिए केंद्र सरकार चाहती है कि इन इकाइयों को और बेहतर बनाया जाए। उन्होंने अफसरों से कहा कि वे खुलकर अपने सुझाव और फील्ड की परेशानियां साझा करें, क्योंकि आपके फीडबैक से ही सिस्टम को सुधारा जा सकता है। टीएडी विभाग के आयुक्त लक्ष्मीनारायण मंत्री ने राजस्थान की मौजूदा स्थिति के बारे में जानकारी दी। उन्होंने बताया कि प्रदेश में फिलहाल उदयपुर, डूंगरपुर, बांसवाड़ा, प्रतापगढ़ और आबूरोड-सिरोही में पांच मुख्य एजेंसियां काम कर रही हैं। कमिश्नर ने इन जिला इकाइयों के पूरे ढांचे को स्पष्ट करते हुए इसे और प्रभावी बनाने के लिए कई महत्वपूर्ण सुझाव भी दिए। उन्होंने जोर दिया कि अगर जिला स्तर पर टीमें मजबूत होंगी, तो योजनाओं का क्रियान्वयन भी उतना ही बेहतर होगा। टीआरआई के निदेशक ओ.पी. जैन ने बताया कि राजस्थान में ये पांचों जिला इकाइयां साल 1974-75 से लगातार काम कर रही हैं। जैन ने एक अहम बात उठाते हुए कहा कि आज के दौर में इन इकाइयों में 'तकनीकी विंग' को और मजबूत करने की सख्त जरूरत है ताकि तकनीकी कामों में देरी न हो। इसके साथ ही आबूरोड़ की उपायुक्त राजलक्ष्मी गहलोत ने सुझाव दिया कि जिला स्तर के साथ-साथ अब ब्लॉक स्तर पर भी ऐसी वर्कशॉप होनी चाहिए ताकि निचले स्तर के कर्मचारियों की समस्याओं को भी सुना जा सके। शिक्षा और खेल पर जोर देते हुए डूंगरपुर के उपायुक्त सत्यप्रकाश कस्वां ने अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि आदिवासी छात्रावासों (हॉस्टल्स) में केवल सुविधाएं देना काफी नहीं है, बल्कि वहां खेलकूद का माहौल बनाना और पढ़ाई की क्वालिटी को सुधारना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए। उदयपुर, प्रतापगढ़ और बांसवाड़ा के उपायुक्तों ने भी अपने इलाकों की जरूरतों के हिसाब से सुझाव दिए। इस मंथन से निकले सुझावों के आधार पर अब जनजाति क्षेत्र के विकास का नया खाका तैयार किया जाएगा।