यूआईटी में लैंड बैंक से 950 भूखंडों का बड़ा घोटाला सामने आया है। इसमें यूआईटी के अफसरों व कर्मचारियों ने भूमाफियाओं से मिलीभगत कर रिकॉर्ड में करीब 300 करोड़ की कीमत के इन भूखंडों का मालिक दूसरों को बना दिया। यूआईटी के प्रॉपर्टी रजिस्टर में जिन लोगों के नाम भूखंड चढ़ाए गए हैं, उनमें से कई लोग तो दुनिया में हैं ही नहीं। मतलब अफसरों व कर्मचारियों ने भूमाफियाओं के साथ मिलकर अपने रिकॉर्ड में ये भूखंड दूसरों के नाम चढ़ा दिए। दैनिक भास्कर इन्वेस्टीगेशन में सामने आया कि ऐसे करीब 319 भूखंडों को तो निरस्त कर दिया है क्योंकि उनके नाम तो यूआईटी के रिकॉर्ड में हैं लेकिन जब यूआईटी ने इनसे दस्तावेज मांगे तो उस नाम के कोई व्यक्ति नहीं आए। बाकी मामलों को दबा दिया। भीलवाड़ा की पटेलनगर, तिलकनगर, बापूनगर, पटेलनगर विस्तार सहित सात अन्य प्रमुख कॉलोनियों में यह भूखंड फर्जीवाड़ा हुआ है। इसमें तिलकनगर के भी 117 प्लॉट हैं। भास्कर ने देखा कि मौके पर ये भूखंड खाली हैं तो कहीं सीमेंट के पोल से बाउंड्री कर दी है। अब दस्तावेजों को रीवैलिडेट के नाम पर पत्रावली गायब बताकर डुप्लीकेट फाइल बनाकर वापस रजिस्ट्री के लिए भेज रहे हैं। इसका सत्यापन उन्हीं प्रॉपर्टी रजिस्टर से हो रहा है जहां फर्जी एंट्री है। यूआईटी ने प्रॉपर्टी रजिस्टर में भूखंडों का आवंटन कर रिकॉर्ड में मालिक दर्ज कर दिया जबकि मौके पर भूखंड खाली हैं। लैंड बैंक का मुख्य रिकॉर्ड जो न्यास के कब्जे में लॉक एंड की में रहता है, उसमें डुप्लीकेट व फर्जी प्रविष्टियां कर प्रॉपर्टी रजिस्टर में दर्ज कर ली हैं ताकि जैसे ही मौका लगे इन भूखंडों के फर्जी दस्तावेज तैयार कर सकें। यह खेल किसके इशारे पर और किनके कार्यकाल में हुआ, इस घपले को दबा दिया गया। प्रॉपर्टी रजिस्टर में कार्यालय आदेश के साथ ही सचिव के साइन व सील भी नहीं हैं। भूखंड शाखा में उस समय के कर्मचारियों ने ही बाइंडिंग के बहाने कुछ भूमाफियाओं के साथ मिलीभगत कर रिकॉर्ड में हेरफेर की। 29 अप्रैल को भूखंड निरस्त, 3 मई को सचिव एपीओ: यूआईटी में भूखंड घोटाले का खुलासा करने वाले दोनों अफसर तत्कालीन सचिव व आईएएस ललित गोयल ने 29 अप्रैल को ऐसे भूखंडों को निरस्त करने के आदेश जारी किए। 3 मई को उन्हें सिंगल ऑर्डर में एपीओ कर दिया। इसके बाद मामले की पूरी पड़ताल करने वाले तहसीलदार दिनेश साहू का भी तबादला हो गया। इनकी फोटोकॉपी करने व रजिस्टर सही करने के नाम पर बाहर ले जाकर फर्जी एंट्रियां कर दी गईं। 499 बीघा में से 288 बीघा अवाप्त, 211 बीघा बाकी यूआईटी में सबसे बड़ा घोटाला मुआवजे का है। इसमें यदि कहीं आठ सौ रुपए स्क्वायर फीट की जमीन अवाप्त की है, उसके बदले मुआवजे में मिलीभगत कर अच्छी लोकेशन के प्लॉट दिए गए हैं। ट्रांसपोर्टनगर की जमीन अधिग्रहण में कई जगह ऐसा ही हुआ। ट्रांसपोर्टनगर के लिए 499 बीघा जमीन रिजर्व की है। इसमें से 288 बीघा जमीन समझौते से अवाप्त कर ली है। फर्जी भूखंडों की सूची, जिनके नाम प्लॉट, वे हैं ही नहीं मोहन के नाम पर 18 प्लॉट, ढूंढा तो कहीं नहीं मिला: रिकॉर्ड में मोहन के नाम पर 18 प्लॉट हैं। इसमें 10 N 42 से 10 N 51 व इसी तरह पटेलनगर के ही G सेक्टर में 10 G 11 से 10 G 20 तक मोहन के प्लॉट हैं। रिपोर्टर प्लॉट पर गया जो खाली हैं। आसपास पूछा तो मोहन कौन है, कोई नहीं जानता कि वे मालिक हैं। इन भूखंडों की कीमत करीब नौ करोड़ रुपए है। गुलाबी के नाम पटेलनगर में 15 प्लॉट हैं, वह नहीं है: पटेलनगर के L सेक्टर में गुलाबी के नाम पर 15 प्लॉट हैं। इसमें 10 L 23 से 10 L 37 तक हैं। इसी तरह केलाराम के नाम पर नौ प्लॉट हैं। माया के नाम पर 12 प्लॉट हैं। इस तरह पटेलनगर का L सेक्टर पूरी तरह फर्जी नामों के नाम कर दिया है। कुछ नीलामी में भूखंड रखे। रिकॉर्ड में देखा तो मालिक के नाम दर्ज थे। शंका हुई तो चेक किया। पता चला कि फर्जी एंट्रियां कर रखी थीं। 319 भूखंड निरस्त किए।" — ललित गोयल, आईएएस व तत्कालीन सचिव "इन प्लॉट की न फाइल है न कोई रिकॉर्ड है। हमने जेईएन से रिपोर्ट मंगवाई। सभी शाखाओं से जानकारी ली लेकिन कहीं कुछ नहीं मिला। प्रॉपर्टी रजिस्टर में बस ऐसे संदिग्ध नामों की एंट्रियां मिलीं।" — दिनेश साहू, तत्कालीन तहसीलदार, UIT