बछ बारस का दिन महिलाओं के लिए ऐसा पर्व, जिसमें पूजा के साथ परिवार, संतान और गौवंश के प्रति सम्मान की भावना जुड़ी हुई है। भीलवाड़ा शहर सहित ग्रामीण क्षेत्रों में बछ बारस पर महिलाओं ने गौ माता और बछड़े को पूजा के लिए तैयार किया। चने-गुड़ का भोग लगाकर आरती उतारी दही-चावल, कुमकुम से तिलक लगाया, लच्छा बांधा, लुगड़ी और कपड़े का बटका ओढ़ाया,आरती उतारी और चने-गुड़ का भोग लगाया।इसके बाद महिलाओं ने बछ बारस की पारंपरिक कथा सुनी। ग्रामीण महिलाओं के अनुसार बछ बारस को वत्स द्वादशी भी कहा जाता है। वत्स का अर्थ बछड़ा होता है। संतान के मंगल से जुड़ा पर्व महिलाओं के लिए यह पर्व विशेष रूप से परिवार और संतान के मंगल से जुड़ा माना जाता है।लोकमान्यता के अनुसार इस दिन गौ माता और बछड़े की पूजा कर महिलाएं संतान के स्वास्थ्य, दीर्घायु और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करती हैं। बुजुर्ग महिलाओं ने नई पीढ़ी को बताई पूजा विधि इस पर्व में महिलाओं की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण रहती है।घर की पूजा की तैयारी से लेकर गौ माता और बछड़े के पूजन,आरती और कथा श्रवण तक की परंपराएं महिलाएं ही निभाती हैं। कई घरों में बुजुर्ग महिलाएं नई पीढ़ी को पूजा की विधि और पर्व से जुड़ी मान्यताओं के बारे में बताती हैं।