कानून ने बेटियों को पैतृक संपत्ति में बेटों के बराबर अधिकार दिया है, लेकिन परिवारों में संपत्ति के बंटवारे की तस्वीर दूसरी भी है। राजस्थान में संपत्ति संबंधी दस्तावेजों में बड़ी संख्या हक त्याग यानी रिलीज डीड की है। वित्तीय वर्ष 2025-26 में प्रदेश में 40,320 हक त्याग दस्तावेज पंजीकृत हुए। यह संख्या इसी अवधि में हुई 38,696 गिफ्ट डीड से भी ज्यादा है। पंजीयन और राजस्व मामलों से जुड़े जानकारों के अनुसार इनमें बड़ी संख्या ऐसे मामलों की है, जिनमें विरासत में हिस्सा मिलने के बाद परिवार का कोई सह-खातेदार अपना हिस्सा दूसरे सह-खातेदार के पक्ष में छोड़ देता है। पारिवारिक मामलों में बहनों द्वारा भाई या मां के पक्ष में हिस्सा छोड़ने के मामले भी लगातार सामने आते हैं। हालांकि सरकारी पंजीयन आंकड़ों में हक छोड़ने वाले व्यक्ति का जेंडर अथवा किस रिश्तेदार के पक्ष में हक छोड़ा गया, इसका अलग आंकड़ा नहीं है। सिर्फ जयपुर में 2025-26 के दौरान 15,009 हक-त्याग दस्तावेज पंजीकृत हुए। प्रदेश में यह संख्या 40,320 रही। अजमेर में भी एक साल में 5,999 हक-त्याग दर्ज हुए। जयपुर में 15 हजार हक त्याग के मामले पंजीकृत; वर्ष 2025-26 में गिफ्ट डीड से ज्यादा रिलीज डीड हुए बेटी को बेटे के बराबर दर्जा हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 में वर्ष 2005 में हुए संशोधन के बाद संयुक्त हिंदू परिवार की मिताक्षरा सहदायिकी संपत्ति में बेटी को बेटे की तरह सहदायिक का दर्जा है। रेवेन्यू मामलों के अधिवक्ता रामप्रकाश कुमावत बताते हैं कि विरासत या सहदायिकी संपत्ति में बेटी को कानून के मुताबिक मिलने वाला हिस्सा केवल बेटी होने से कम नहीं किया जा सकता। अधिवक्ता बजरंग लाल चौधरी के अनुसार किसी संपत्ति में वैध हिस्सा मिलने के बाद पुत्री भी दूसरे सह-खातेदार की तरह अपने अधिकार का त्याग कर सकती है। अचल संपत्ति से जुड़े ऐसे हक-त्याग के लिए विधिसम्मत दस्तावेज और उसका पंजीयन महत्वपूर्ण है। जहां मतभेद, वही मामले कोर्ट पहुंच रहे भास्कर एक्सपर्ट सुनील चौधरी, राजस्व मामलों के नीति-पत्र लेखक महावीर सुरेंद्र जैन, एडवोकेट व पूर्व अध्यक्ष, सांगानेर बार एसोसिएशन हक-त्याग में पैसा लेना जरूरी नहीं, हक छोड़ने के बाद वापस हासिल करना आसान नहीं रहता