सज्जनगढ़ सेंचुरी की लायन सफारी में एशियाटिक शेरनी ‘सुनैना’ ने रविवार दोपहर तड़प-तड़पकर दम तोड़ दिया। वह 5 साल की थी और करीब तीन महीने से बीमारी से जूझ रही थी। सुनैना की इस दुखद मौत ने वन विभाग और लायन सफारी मैनेजमेंट की निगरानी, मेडिकल व्यवस्था तथा सफारी की सुरक्षा प्रणाली के तमाम दावों की धज्जियां उड़ा दी हैं। दो साल पहले 1 अगस्त, 2024 को गुजरात के जूनागढ़ स्थित सक्करबाग चिड़ियाघर से लाए गए नर शेर सम्राट के साथ सुनैना की ब्रीडिंग कराने की एक बड़ी योजना थी। लेकिन इन शानदार शेरों का कुनबा बढ़ाना तो दूर, अफसरों और प्रबंधन की आपराधिक बेपरवाही के चलते शेरनी को जान से हाथ धोना पड़ा। उसकी मौत के साथ विभाग का यह ड्रीम प्रोजेक्ट भी फिलहाल खत्म हो गया। अब लायन सफारी में सम्राट अकेला रह गया है। चिचड़ का शिकार हुई, इंफेक्शन के कारण एर्लिकियोसिस हुआ विभाग के अनुसार सुनैना सबसे पहले इसी साल 24 मई को गंभीर रूप से बीमार हुई थी। तब उसके शरीर का तापमान रिकॉर्ड 106.3 डिग्री तक पहुंच गया था। डॉक्टरों ने आनन-फानन में तत्काल फ्लूड्स, एंटीबायोटिक्स और एंटीपायरेटिक दवाएं देकर प्राथमिक इलाज शुरू किया। फिर 27 मई को क्षेत्रीय रोग निदान प्रयोगशाला (आरडीडीसी) से आई ब्लड रिपोर्ट में क्रिएटिनिन, सीरम यूरिया, एसजीपीटी और एसजीओटी के स्तर बेहद बढ़े हुए मिले। इसने साफ कर दिया कि संक्रमण किडनी और लिवर तक गहराई से पहुंच चुका था। इसके बाद सीरम के सैंपल बरेली स्थित इंडियन वेटरनरी रिसर्च इंस्टीट्यूट (आईवीआरआई) को भेजे गए। वहां आरटी-पीसीआर जांच में ‘एर्लिकियोसिस’ जैसे घातक संक्रमण की पुष्टि हुई। डॉक्टरों के अनुसार हालत में मामूली सुधार आने पर संक्रमण को खत्म करने के लिए 28 दिन का विशेष दवा कोर्स भी शुरू किया गया। लेकिन इलाज का दायरा स्थानीय स्तर से बाहर नहीं निकल सका और सुनैना को बचाया नहीं जा सका। सुनैना खामोश... सिस्टम की नाकामी पर दहाड़ रहे 3 सवाल 1. हालत नाजुक हुई तो क्यों करते रहे लोकल ट्रीटमेंट? सुनैना तीन महीने से बीमार थी। उसकी स्थिति दिन-ब-दिन बिगड़ती जा रही थी। इसके बावजूद स्थानीय वन विभाग ने बाहर से विशेषज्ञ चिकित्सकों की टीम बुलाकर इलाज कराने की जरूरत क्यों नहीं समझी? इलाज की खानापूर्ति मुख्य रूप से स्थानीय स्तर पर ही चलती रही। जब विभाग के पास इतने संवेदनशील वन्यजीवों की निगरानी और इलाज की सीधी जिम्मेदारी है, तो शुरुआत में ही इसे गंभीरता से क्यों नहीं लिया गया? 2. अवैध पशु बाड़ों को का कुछ किया क्यों नहीं? सुनैना किसी जंगली कीट के हमले से नहीं, बल्कि पालतू मवेशियों और कुत्तों में पाए जाने वाले ‘टिक्स’ यानी चिचड़ों से होने वाले घातक संक्रमण की चपेट में आई थी। खुद वन अधिकारियों का कहना है कि लायन सफारी की दीवार से सटाकर कई लोगों ने अवैध पशु बाड़े बना रखे हैं। इन्हीं बाड़ों में पल रहे मवेशियों के चिचड़ ही सुनैना तक पहुंचे और संक्रमण फैलने का मुख्य जरिया बने। सफारी की बायो-सिक्योरिटी में इतनी बड़ी चूक का जिम्मेदार कौन है? किसी ने इन बाड़ों को लेकर कार्रवाई क्यों नहीं की? 3. 10 की जगह 2 केयरटेकर, निगरानी कैसे होती? लायन सफारी व बायो पार्क जैसे विशाल-संवेदनशील इलाके में वन्यजीवों की देखभाल के लिए 2 केयरटेकर ही हैं, जबकि यहां कम से कम 10 केयरटेकरों की जरूरत है। इतने बड़े क्षेत्र और अति-संवेदनशील वन्यजीवों की निगरानी इतने कम कर्मचारियों के भरोसे छोड़ना सीधी लापरवाही है। वन्यजीव के बीमार होने के शुरुआती लक्षणों की पहचान करना, समय पर मेडिकल रिपोर्टिंग, दवाओं की खुराक और उसके दैनिक व्यवहार में बदलाव पर बारीक नजर रखना केयरटेकर व्यवस्था का अहम हिस्सा है। 2 साल से रोमांचित कर रहा था जोड़ा, अब सम्राट अकेला सुनैना और सम्राट को दो साल पहले एनिमल एक्सचेंज प्रोग्राम के तहत जूनागढ़ (गुजरात) के सक्करबाग चिड़ियाघर से लाया गया था। तब सुनैना महज 3 साल की थी और सम्राट 3 साल 7 महीने का था। इस जोड़े के बदले में सज्जनगढ़ बायो पार्क से लोमड़ी, जैकाल, जंगली बिल्ली के दो-दो जोड़े, हायना का एक जोड़ा और दो चिंकारा दिए गए थे। लायन जोड़े को इसी साल फरवरी में आधिकारिक तौर पर नई लायन सफारी के खुले एनक्लोजर में छोड़ा गया। इसका उद्घाटन पंजाब के तत्कालीन राज्यपाल गुलाबचंद कटारिया ने किया था। सफारी की शुरुआत से पहले (जनवरी में) सुनैना एक बार वन विभाग की नींद उड़ा चुकी थी। सफारी के होल्डिंग एरिया में छोड़े जाने के बाद वह 4-5 दिन तक अपने शेल्टर तक नहीं लौटी थी। विभाग की टीम 20 हेक्टेयर इलाके में निगरानी करती रही, हालांकि बाद में वह झाड़ियों में दुबकी मिल गई थी। सज्जनगढ़ बायो पार्क : साढ़े 6 साल में 3 बाघ-बाघिन और 4 भेड़िए दम तोड़ चुके अब जांच के नाम पर जिम्मेदारों की पल्ला झाड़ने की कोशिश सुनैना की मौत हो गई है। उसे नाइट शेल्टर में रखा गया था। इस पूरे मामले में विस्तृत जांच की जा रही है। -अनुराग भटनागर, डीएफओ (वन्यजीव)