नमस्कार, पार्षद उम्मीदवार के समर्थन में चौमूं के पूर्व विधायक ने कुंआरे लड़कों की शादी कराने की गारंटी दे दी। जोधपुर में सिंबल पाने के लिए प्रत्याशी कनक दंडौती करते हुए रिटर्निंग अधिकारी के दफ्तर पहुंच गई। कोटपूतली में भाजपा प्रत्याशी तीन दिन तक लगातार बसों में घूमता रहा और जन्माष्टमी पर सामाजिक समरसता की तस्वीर नजर आई। राजनीति और ब्यूरोक्रेसी की ऐसी ही खरी-खरी बातें पढ़िए, आज के इस एपिसोड में… 1. पूर्व विधायक की 'शादी' वाली गारंटी नेताजी वोटर्स को कैसे-कैसे प्रलोभन दे रहे हैं। चौमूं वाले पूर्व विधायक रामलाल शर्मा ने बोल दिया- हमारे फलां उम्मीदवार को वोट दोगे तो मेरी गारंटी है कि कुंवारे बैठे लड़के की शादी करा दूंगा। कोई न कोई व्यवस्था कर ही दूंगा। 'व्यवस्था' की बात सुनकर कुंवारों के मन में लड्डू फूटा। एक स्वर में सभी ने कहा- अब तो राजकुमार जी को जिताकर ही दम लेंगे। वैसे शादी की गारंटी पूर्व विधायक जी पहली बार नहीं दे रहे थे। बीते साल भी उन्होंने कुंवारों का मुद्दा उठाया और विश्वास दिलाया था कि शादी करा दूंगा। उन पर भरोसा करके 43 साल के एक व्यक्ति ने भावभीनी चिट्ठी प्रार्थना पत्र के रूप में लिख दी थी। कहा था- मेरी शादी नहीं हो रही। जैसा कि आपने कहा था कि शादी करा दूंगा। तो आपसे विनम्र अनुरोध है कि मेरी शादी करा दीजिए। उम्र निकली जा रही है। पता नहीं उन भाईसाहब की शादी हुई या नहीं हुई। साल बीतने को आया। पूर्व विधायक जी ने फिर शादी कराने की गारंटी दे दी है। वैसे अगर रामलाल जी शादी कराने में कामयाब हो गए तो हलवाई की टेंशन नहीं है, वे कड़ाही कला में निपुण हैं। कई मौकों पर झर से जौहर दिखाया है। 2. सिंबल के लिए कनक दंडौती चुनाव में भी कैसे-कैसे काम करने पड़ते हैं। हालांकि नेतागण सारे काम दिल से करते हैं। उन्हें पता है कि एक बार अगर 5 साल के लिए राज कर लिया तो पीढ़ियों का इंतजाम किया जा सकता है। यही वजह है कि पार्षद जैसे छोटे चुनाव के लिए भी नेतागण जी-प्राण देने को तैयार हैं। जोधपुर में वार्ड 91 से सीता देवी निर्दलीय उम्मीदवार हैं। सिंबल लेने के लिए वे रिटर्निंग अधिकारी के दफ्तर पहुंचीं। रिटर्निंग अधिकारी न हुए, कुलदेवता हो गए। सीता देवी और उनके पति श्रवण कुमार सड़क पर कनक दंडौती लगाते हुए दफ्तर पहुंचे। एक बार तो लोगों को लगा कि मंदिर की तरफ जा रहे हैं। लेकिन कनक दंडवत की यात्रा जब रिटर्निंग अधिकारी के दफ्तर जाकर पूरी हुई तो लोग समझ गए कि सिंबल के लिए आस्था का सोता बह रहा है। जयपुर के परकोटा इलाके में बीजेपी के एक प्रत्याशी ढोल-ताशों के साथ इलाके में पहुंचे। वे घर-घर हाथ जोड़कर वोट मांग रहे थे। एक मकान की छत से ‘भरा हुआ’ वोटर यह सब देख रहा था। उसने उसी ऊंचाई से ऊंची बात कही- श्रीमानजी इलाके में यह कचरे का ढेर देख रहे हैं? जिस तरह वोट बटोरने आए हो, इस कचरे को भी बटोर ले जाओ। नागौर के कुचेरा में पूर्व विधायक रिछपाल मिर्धा और विधायक रेवंतराम डांगा तो अभी तक 33 करोड़ देवी-देवताओं का जयकारा लगाते हुए फीते काट रहे हैं। वहीं बगरू विधायक कैलाश वर्मा ने लोगों को जन्माष्टमी की दुहाई दे दी। बोले- जन्माष्टमी पर वादा करो कि फलां प्रत्याशी को वोट दोगे तो यह माला मैं उनके गले में डाल दूं। बोलो डाल दूं? बोलो डाल दूं? 3. ‘लापता कैंडिडेट’ दिल्ली में मिला कोटपूतली के वार्ड 32 के भाजपा कैंडिडेट बुधराम ने नत्था की याद दिला दी। नत्था कौन ? नत्था पीपली लाइव फिल्म में मुख्य किरदार था। सरकार से मुआवजा पाने की चाहत में नत्था आत्महत्या की घोषणा कर देता है। इसके बाद उसे रोकने के लिए सियासी तमाशा शुरू होता है। देशभर की मीडिया नत्था के गांव में डेरा डाल देती है। नत्था के अलावा हर कोई चाहता है कि वह आत्महत्या कर ले। चारों तरफ से घिरा नत्था तमाशे को वहीं छोड़कर भाग जाता है। वह दूर किसी महानगर में मजदूरी करने लगता है। बुधराम ने पता नहीं किस मुहूर्त में चुनाव के लिए फॉर्म भरा था। उन्हें भाजपा से टिकट मिल गया। इसके बाद धकड़-पकड़ लग गई। उन्होंने पहले कभी चुनाव नहीं लड़ा। जबकि दूसरे राजनीतिक दल से मैदान में उतरे लोग रसूखदार। राजनीतिक परिवार से सरोकार। प्रत्याशी का पति सरपंच। बुधराम डर गए। वे गुपचुप घर से निकल गए। जीप में बैठकर कोटपूतली पहुंच गए। कोटपूतली से रोडवेज बस में चढ़े और सीकर पहुंचे। यहां दिल्ली की बस में बैठे। दिल्ली पहुंचकर अलवर की बस में चढ़े। अलवर से बहरोड़। बहरोड़ से फिर दिल्ली। तीन दिन वे ऐसे ही घूमते रहे। तब तक गांव में हड़कंप मच गया था। बुधराम जी कहां गए? बात थाने तक पहुंची। दूसरे प्रत्याशी इतना डर गए कि कहीं बुधराम जी को गायब कराने का आरोप उन पर न लग जाए। ऐसे में कांग्रेस प्रत्याशी थाने के बाहर धरने पर बैठ गईं। बोली- बुधराम जी को ढूंढकर लाओ। पुलिस उन्हें दिल्ली से पकड़ लाई। घर वालों के सुपुर्द कर दिया। चुनाव लड़ने से पहले ही बुधराम ने पुलिस और विरोधियों को छका दिया। वोटिंग से पहले ये रंग हैं, जीत गए तो कहर ढाएंगे। 4. चलते-चलते… और अब चलते-चलते बात उस भारत की जिसकी जड़ों में समरसता रही है। रहीम दास ने कहा था- गही शरणागत राम के भवसागर के नाव। रहिमन जगत उद्धार को और न कछू उपाव। जन्माष्टमी पर ऐसी कई तस्वीरें आईं जिनमें मुस्लिम परिवार के बच्चे कृष्ण कन्हैया बनकर माता-पिता के साथ स्कूल के प्रोग्राम में हिस्सा लेने जा रहे हैं। माता-पिता भी उन्हें लाड़ लड़ाते हुए स्कूल छोड़ने जा रहे हैं। कई ऐसे बड़े मंदिर हैं जहां भगवान को पोशाक मुस्लिम कारीगर तैयार करते हैं। जयपुर के पन्नीगरान मोहल्ले में मुस्लिम समाज के लोग चांदी का बरक तैयार करते हैं। यह बरक भगवान गणेश और हनुमान जी की प्रतिमाओं पर चोला चढ़ाने के काम आता है। मकर संक्रांति पर पतंगें हों, होली के रंग हों या फिर दीपावली के पटाखे, मुस्लिम परिवार पीढ़ियों से हमारे त्योहारों में रंग भरते आ रहे हैं। यह समरसता एकतरफा नहीं है। तीज की सवारी हो या फिर ताजियों का जुलूस जयपुर शहर के लोग देखने को साथ-साथ उमड़ते हैं। यहां जैसी ईद वैसी दीपावली। अजमेर के दरगाह शरीफ पर मत्था टेकने वालों और चादर चढ़ाने वालों में हिंदुओं की तादाद कम नहीं। आपसी भाईचारा, एक दूसरे के रीति-रिवाज, परंपराओं का सम्मान करना हमारी जड़ों में रहा है। समाज ऐसी दरार बनने ही क्यों दे जिसमें किसी सियासी महत्वकांक्षा को घुसने की जगह मिल जाए। इनपुट सहयोग- मनोज सैनी (चौमूं, जयपुर), जयदीप पुरोहित (जोधपुर), धर्मसिंह यादव (कोटपूतली)। वीडियो देखने के लिए सबसे ऊपर फोटो पर क्लिक करें। अब मंगलवार सुबह 7 बजे मुलाकात होगाी।