2015 की चयन प्रक्रिया से भर्ती किए गए करीब 11 हजार स्कूल व्याख्याताओं से जुड़े वरिष्ठता विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान हाईकोर्ट के 8 जुलाई 2026 के फैसले को बरकरार रखा है। न्यायमूर्ति केवी विश्वनाथन और न्यायमूर्ति अरुण पल्ली की पीठ ने मामले में दायर विशेष अनुमति याचिकाओं के समूह को खारिज कर दिया। कोर्ट ने रिकॉर्ड की जांच के बाद हाईकोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप की कोई गुंजाइश नहीं मानी। फैसले के बाद अब व्याख्याताओं की वरिष्ठता सूची नए सिरे से तैयार की जाएगी और डीपीसी भी दोबारा कराई जाएगी। एक भर्ती, लेकिन अलग-अलग तारीखों पर नियुक्तियां बनीं विवाद की वजह विवाद आरपीएससी की ओर से 16 अक्टूबर 2015 को जारी विज्ञापन के जरिए विभिन्न विषयों में स्कूल लेक्चररों की भर्ती से जुड़ा था। चयन प्रक्रिया एक ही थी, लेकिन अलग-अलग विषयों के परिणाम अलग-अलग तारीखों पर घोषित हुए। इसके चलते नियुक्ति आदेश भी अलग-अलग समय पर जारी किए गए। वरिष्ठता सूची मुख्य रूप से नियुक्ति की तारीख के आधार पर तैयार की गई। इसे इस आधार पर चुनौती दी गई कि परिणाम, अनुशंसा या प्रशासनिक प्रक्रिया में देरी के कारण योग्य अभ्यर्थियों को नुकसान हुआ। याचिकाकर्ताओं की मांग थी कि एक ही चयन प्रक्रिया में चयनित अभ्यर्थियों की वरिष्ठता नियुक्ति की तारीख के बजाय उनकी योग्यता और मेरिट के आधार पर तय की जाए। हाईकोर्ट ने भी मेरिट के आधार पर वरिष्ठता की बात कही थी राजस्थान हाईकोर्ट ने माना था कि संबंधित नियम एक ही चयन प्रक्रिया में अलग-अलग विषयों में नियुक्त स्कूल व्याख्याताओं के लिए समान वरिष्ठता सूची बनाने की स्थिति को पर्याप्त रूप से स्पष्ट नहीं करते हैं। हाईकोर्ट ने कहा था कि वरिष्ठता का इस्तेमाल पदोन्नति के समान और निष्पक्ष अवसरों से वंचित करने के लिए नहीं किया जा सकता। अदालत ने उप-प्रधानाचार्य पद पर पदोन्नति से जुड़े कानूनी प्रावधानों में विषयों को प्राथमिकता नहीं दिए जाने की बात भी कही थी। वरिष्ठता सूची तैयार करने के तरीके के कारण कुछ विषयों के शिक्षक प्रशासनिक प्रक्रिया में पहले नियुक्त होने से उन अभ्यर्थियों से वरिष्ठ हो गए, जिनके चयन में मेरिट बेहतर थी। नियम 36 के क्रियान्वयन से शुरू हुआ विवाद विवाद की जड़ राजस्थान शिक्षा (राज्य एवं अधीनस्थ) सेवा नियम-2021 के नियम 36 के प्रावधान-1 के क्रियान्वयन को माना गया है। शिक्षा विभाग और आरपीएससी की प्रक्रिया में अलग-अलग विषयों के अभ्यर्थियों को अलग-अलग चरणों में नियुक्तियां मिलीं। छोटे विषयों के अभ्यर्थियों को समय पर जॉइनिंग मिल गई और वे 2016-17 की सूची में शामिल हो गए। वहीं बड़े विषयों के अभ्यर्थी प्रशासनिक देरी के कारण बाद में कार्यग्रहण कर सके। विभाग ने आरपीएससी की मेरिट के बजाय जॉइनिंग की तारीख को वरिष्ठता का आधार बना दिया। इससे एक ही विज्ञापन और चयन प्रक्रिया से चुने गए अभ्यर्थियों के बीच जॉइनिंग की तारीख के कारण करीब दो साल तक का वरिष्ठता अंतर पैदा हो गया। इस व्यवस्था में कम अंक पाने वाले कुछ शिक्षक वरिष्ठ हो गए, जबकि ज्यादा अंक पाने वाले शिक्षक जूनियर हो गए। 2013, 2015 और 2018 भर्ती के शिक्षक प्रभावित इस विवाद से 2013, 2015 और 2018 की प्राध्यापक भर्तियों के करीब 11 हजार व्याख्याता सीधे प्रभावित बताए गए हैं। इसके अलावा विभागीय पदोन्नति के जरिए वरिष्ठ अध्यापक से व्याख्याता बने कार्मिक भी इस प्रक्रिया से प्रभावित होंगे। इसके साथ विभागीय पदोन्नति से वरिष्ठ अध्यापक से व्याख्याता बने कार्मिक भी शामिल हैं। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार नियम 36 के तहत 10 अक्टूबर 2002 की अधिसूचना के अनुसार आरपीएससी द्वारा लिखित परीक्षा और साक्षात्कार के अंकों के आधार पर तैयार मेरिट के क्रम में मिश्रित/एकीकृत वरिष्ठता तय की जाएगी। 40 महीने में 178.56 करोड़ रुपए के अतिरिक्त भुगतान का दावा इस विवाद का असर शिक्षा विभाग के वित्तीय प्रबंधन पर भी पड़ा। विभाग की ओर से पिछले 40 महीनों में 178.56 करोड़ रुपए के अतिरिक्त भुगतान का दावा किया गया है। डीपीसी के बाद पदोन्नत शिक्षकों को नए पदों पर पदस्थापित करने के बजाय यथास्थान ही कार्यरत रखा गया और उन्हें उच्च पे-स्केल का भुगतान शुरू कर दिया गया। दावे के अनुसार 5,048 वाइस प्रिंसिपल, 3,200 प्रिंसिपल और 8,000 वाइस प्रिंसिपल सहित कुल 16,248 कार्मिकों को नए पद का कार्यभार संभाले बिना बढ़ा हुआ वेतन दिया गया। इससे सरकार पर हर महीने करीब 8.12 करोड़ रुपए का अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ रहा था। करीब 6 हजार उप प्राचार्यों की पदोन्नति प्रभावित होगी हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद पुरानी वरिष्ठता सूची और उसके आधार पर हुई डीपीसी निरस्त होने की स्थिति बन गई है। वर्तमान में उप प्राचार्य पद पर कार्यरत करीब 6 हजार शिक्षकों की पदोन्नति सूची भी निरस्त होगी और उन्हें दोबारा व्याख्याता पद पर रिवर्ट किया जाएगा। वित्त विभाग के नियमों के अनुसार माध्यमिक शिक्षा विभाग, बीकानेर को अब पारदर्शी कॉमन वरिष्ठता सूची नए सिरे से तैयार करनी होगी। इसके बाद दोबारा डीपीसी कराई जाएगी। नई प्रक्रिया के बाद चयनित शिक्षकों को नोशनल पे-फिक्सेशन और नए पद पर कार्यग्रहण करने के बाद नकद भुगतान का वैधानिक लाभ मिल सकेगा। 25 अगस्त की बैठक में नहीं हुआ फैसला फैसले को लागू करने के लिए स्थायी समिति की बैठक 25 अगस्त को हुई थी। हालांकि, बैठक में इस संबंध में कोई निर्णय नहीं हो सका और फैसला अगली तारीख तक टाल दिया गया। शिक्षक संघ ने की फैसले की पूर्ण पालना की मांग शिक्षक संघ रेसटा, राजस्थान के प्रदेशाध्यक्ष मोहर सिंह सलावद ने बताया कि व्याख्याता से उप प्राचार्य की वरिष्ठता के विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान हाईकोर्ट के 8 जुलाई के फैसले को बरकरार रखा है। उन्होंने राज्य सरकार और शिक्षा विभाग से सुप्रीम कोर्ट के निर्णय की पूर्ण पालना सुनिश्चित करने की मांग की। साथ ही सत्र 2012-13 में वरिष्ठ अध्यापक से व्याख्याता पदोन्नति के लिए बनाई गई वरिष्ठता सूची की भी जांच की मांग की। सलावद के अनुसार सत्र 2011-12 तथा 2013-14 से 2025-26 तक की वरिष्ठता सूची मेरिट के आधार पर तैयार की गई, जबकि सत्र 2012-13 में अलग नियम अपनाया गया था।