राजस्थान लोक सेवा आयोग के सचिव पद से रिटायर्ड IAS अधिकारी रामनिवास मेहता ने राजनीति से लेकर न्याय व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने लिखा कि आजादी के 80 साल बाद भी आम नागरिक अपने अधिकारों से वंचित क्यों है और समाज में भाईचारा व सौहार्द्र क्यों कम होता जा रहा है। अधिकारी ने अपनी बुक ' ‘डर, साहस और भी बहुत कुछ’ में सरकारी सेवा के दौरान सामने आए कई अनुभव साझा किए हैं। इनमें एक राजनीतिक नेता द्वारा धमकी दिए जाने के बावजूद सरकारी कर्तव्य पर डटे रहना, अपने साथ हुई कथित नाइंसाफी के खिलाफ लंबी कानूनी लड़ाई लड़ना, उदयपुर की ऐतिहासिक झील में होटल निर्माण का मामला और नौकरशाही व लोकतांत्रिक व्यवस्था पर उनके विचार शामिल हैं। रामनिवास मेहता 31 जुलाई 2026 को आरपीएससी सचिव पद से रिटायर हो गए। जनप्रतिनिधि आधुनिक दौर के राजा मेहता ने अपनी पुस्तक में सवाल उठाया कि आखिर गलतियां कहां हो रही हैं-क्या चुने हुए जनप्रतिनिधि आधुनिक दौर के राजा-महाराजा बन रहे हैं, सरकारी कर्मचारी लोकसेवक का धर्म नहीं निभा रहे या समाज में ही नैतिक पतन बढ़ रहा है। उन्होंने जनसेवा का दिखावा करने वाले लोगों पर लिखा कि ऐसे लोग व्यवस्था में मुश्किलें बढ़ा रहे हैं। न्याय व्यवस्था पर भी उन्होंने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि कई बार तुरंत न्याय की उम्मीद के बजाय तारीख पर तारीख और लंबी कानूनी प्रक्रिया ही न्याय का पर्याय बन जाती है। उनका कहना है कि ऐसी व्यवस्थाओं को बदले बिना आम नागरिक को वह सामाजिक वातावरण नहीं मिल सकता, जिसका वह हकदार है। नौकरशाहों को राजनीतिक नजदीकी से बचने की सलाह मेहता ने अधिकारियों को सलाह दी है कि चुनाव में पूर्ण निष्पक्षता और पारदर्शिता बरती जानी चाहिए है। यह न केवल कानूनी अपेक्षा है बल्कि ऐसा किया जाना स्वयं अधिकारी की सुरक्षा और मानसिक शांति के लिए जरूरी है। उन्होंने युवाओं और ईमानदार अधिकारियों से अपील की कि व्यवस्था में कठिनाइयों के बावजूद वे अपने कर्तव्य और नैतिकता से समझौता न करें। उनका कहना है कि परेशानियों के बीच गलत रास्ते और आसान विकल्प आकर्षक लग सकते हैं, लेकिन अनैतिक रास्ता अंततः व्यक्ति की मूल व्यवस्था को खत्म कर देता है। पूर्व अधिकारी ने कहा कि राजनीतिक नेतृत्व, सरकारी मशीनरी और न्यायपालिका में बड़े सकारात्मक बदलाव का आम आदमी आज भी बेसब्री से प्रतीक्षा कर रहा है। पुस्तक लिखने का उद्देश्य युवाओं को सरकारी तंत्र की वास्तविक कार्यप्रणाली और उन चुनौतियों से परिचित कराना है, जिनका सामना ईमानदारी से काम करने वालों को करना पड़ सकता है। उच्च शिक्षा को लेकर जताई चिंता मेहता ने राजस्थान की उच्च शिक्षा व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने निजी विश्वविद्यालयों में कथित अनियमितताओं, फर्जी डिग्रियों और कम समय में पीएचडी दिए जाने जैसी बातों का उल्लेख करते हुए इसे शैक्षिक पतन का संकेत बताया। उनका कहना है कि विश्वविद्यालयों से जुड़े कानून विधानसभा में पर्याप्त चर्चा के बिना पारित हो जाते हैं और राज्य सरकार के पास अनियमितताओं की जांच से लेकर विश्वविद्यालय को भंग करने तक की शक्तियां मौजूद हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि जब निगरानी की व्यवस्था मौजूद है तो उसका प्रभावी इस्तेमाल क्यों नहीं किया जाता। उदयसागर झील के होटल मामले में खुद पर लगा जुर्माना उदयपुर की उदयसागर झील में होटल निर्माण के मामले को भी मेहता ने पुस्तक में विस्तार से लिखा है। उनके अनुसार यूआईटी सचिव रहते हुए उन्होंने वेटलैंड नियमों का उल्लंघन पाए जाने पर होटल निर्माण की अनुमति के नवीनीकरण का आवेदन खारिज कर दिया था। होटल मालिक ने उनके आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में शिकायत की। मेहता के मुताबिक 29 अक्टूबर 2014 को सुप्रीम कोर्ट ने उन पर एक लाख रुपये का जुर्माना लगाया। इसके बाद उन्होंने यूआईटी से निर्माण अनुमति का नवीनीकरण कर दिया। एक घटना जिससे मुझे लगा मेरा ट्रांसफर हो जाएगा उन्होंने किताब में 3 फरवरी 2005 की अपनी एक घटना का जिक्र करते हुए लिखा, जब वह झालावाड़ के मनोहर थाना के एसडीएम थे और उपसरपंच चुनाव में दोबारा मतदान की मांग को लेकर विधायक कंवरलाल मीणा ने उनकी कनपटी पर पिस्टल तान दी थी। मेहता ने लिखा कि घटना के बाद 15 मार्च 2005 को तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने उन्हें बुलाकर पूरी जानकारी ली। उनके मुताबिक मुख्यमंत्री ने करीब 12 मिनट तक बिना कुछ बोले उनकी बात सुनी। मेहता को लगा था कि शायद उनका तबादला झालावाड़ से कर दिया जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ और वे करीब एक साल तक वहीं पदस्थ रहे।