घूघरा स्थित प्रदेश की एकमात्र हाई सिक्योरिटी जेल की सेल में अकेले रह रहे हार्डकोर बंदियों के लिए किताबें, अखबार और पत्रिकाएं अब समय बिताने के साथ बाहरी दुनिया से जुड़ने और सकारात्मक सोच विकसित करने का जरिया बन रही हैं। इस जेल में 80 हार्डकोर बंदी निरुद्ध हैं। इनमें करीब 70 बंदी नियमित रूप से किताबें पढ़ रहे हैं। कई बंदी एक सप्ताह में ही नई किताब मांग लेते हैं। दो साल पहले शुरू की गई रिवॉल्विंग लाइब्रेरी अब जेल व्यवस्था का अहम हिस्सा बन गई है। जेल अधीक्षक पारस जांगिड़ के मुताबिक जेल की क्षमता 264 बंदियों की है। यहां सेलुलर कन्साइनमेंट की व्यवस्था है। एक सेल में तीन बंदियों को रखने की क्षमता है, लेकिन सुरक्षा कारणों से अधिकांश बंदियों को अलग-अलग सेल में रखा जा रहा है। ऐसे में बंदियों का दिन का बड़ा हिस्सा अकेले सेल में गुजरता है। सेल के अंदर टीवी जैसी मनोरंजन की सुविधा नहीं है। सुरक्षा कारणों से सामूहिक गतिविधियां भी सीमित हैं। पहले बंदी लूडो, कैरम, शतरंज और चौपड़ जैसे इंडोर गेम खेलते थे, लेकिन जगन हत्याकांड के बाद सुरक्षा व्यवस्था सख्त कर दी गई। दिन में बंदी प्राकृतिक रोशनी में किताबें पढ़ते हैं। रात में सेल के बाहर ब्लॉक में लगी लाइट की रोशनी सलाखों से छनकर अंदर आती है, कई बंदी इसी रोशनी में किताब पढ़ते नजर आते हैं। एक हजार किताबें उपलब्ध जेल अधीक्षक जांगिड़ ने बताया कि उनके पिछले कार्यकाल में एक भामाशाह के सहयोग से लाइब्रेरी शुरू की गई थी। अब इसमें साहित्यिक, धार्मिक, कहानियां, मोटिवेशनल स्टोरी और महापुरुषों की आत्मकथाओं सहित करीब 800 किताबें हैं। इन किताबों का उद्देश्य बंदियों को सकारात्मक सोच, आत्मचिंतन और मानवतावादी दृष्टिकोण से जोड़ना है। हाल ही में जेल महानिदेशालय की ओर से भी करीब 200 पुस्तकें उपलब्ध कराई गई हैं। जेल में हिंदी और अंग्रेजी के अखबारों की रोज 100 प्रतियां आती हैं।