इस समस्या के स्थायी समाधान के लिए रोडवेज और नगर परिषद को मिलकर संयुक्त कार्ययोजना बनानी होगी। सबसे पहले दोनों विभागों के बीच सफाई का दायरा स्पष्ट रूप से तय होना चाहिए। सुविधाघरों के रखरखाव के लिए पे एंड यूज मॉडल को पारदर्शी तरीके से लागू किया जा सकता है। कचरा निस्तारण के लिए डस्टबिन लगाए जाएं। हर दिन दो बार कचरा उठाने की व्यवस्था हो। डिपो परिसर में गंदगी फैलाने वालों पर जुर्माने का प्रावधान होना चाहिए। सफाई में लापरवाही बरतने वाले ठेकेदारों पर भी भारी जुर्माना लगे। परिसर में दाखिल होते ही यात्रियों का सामना गंदगी और बदबू से होता है। बसों के इंतजार में बैठे यात्रियों को सांस लेना तक दूभर हो जाता है। सबसे बदतर हालत डिपो के सुविधाघरों की है। कई शौचालयों में नल गायब हैं। पानी की समुचित व्यवस्था नहीं है। सफाई नहीं होने से मूत्रालय बीमारी फैलाने वाले केंद्र बन चुके हैं। मुख्य प्लेटफॉर्म से लेकर वेटिंग एरिया तक कचरा फैला रहता है। रोडवेज बसों के खड़े होने वाले प्लेटफॉर्म और पार्किंग एरिया में कचरा सड़ने लगता है। इससे पूरे बस स्टैंड में संक्रमण फैलने का खतरा बना रहता है। इस बदहाली की सबसे बड़ी वजह रोडवेज प्रशासन और नगर परिषद के बीच समन्वय का अभाव है। रोडवेज सफाई का जिम्मा नगर परिषद का समझकर काम नहीं करा रहा है। नगर परिषद इसे रोडवेज डिपो का आंतरिक मामला मान लेती है। इसके अलावा सफाई कर्मचारियों की कमी भी कारण है। ठेका व्यवस्था पर सही मॉनिटरिंग नहीं हो रही है। सफाई का ठेका जिन एजेंसियों को दिया जाता है, उन पर लापरवाह रवैये के बावजूद कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं होती। नियमित निरीक्षण नहीं होता। भास्कर न्यूज | झुंझुनूं शहर का रोडवेज डिपो इन दिनों प्रशासनिक उपेक्षा का शिकार बना हुआ है। डिपो परिसर में स्वच्छ भारत अभियान के दावों की पोल खुलती दिख रही है। पूरे परिसर में फैली गंदगी, बदबूदार सुविधाघरों, बिखरे कचरे से यात्री परेशान हैं। डिपो पर यात्रियों को बदबूदार माहौल में बस का इंतजार करना पड़ता है। सबसे ज्यादा परेशानी महिला यात्रियों और बुजुर्गों को हो रही है। डिपो को स्वच्छ रखने में रोडवेज प्रशासन लापरवाही बरत रहा है। दूसरी ओर नगर परिषद भी इसे साफ कराने में रुचि नहीं ले रही है। दोनों विभाग एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डाल रहे हैं।