मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय के विकास के लिए पिछले 45 साल से उलझी बहुचर्चित 14.59 हेक्टेयर (करीब 57 बीघा) चंपा बाग आबादी भूमि के अधिग्रहण को राज्य सरकार अब ड्रॉप (बंद) करने जा रही है। कलेक्टर कार्यालय ने प्रदेश सरकार को विस्तृत समीक्षा रिपोर्ट भेजकर इस पूरी अवाप्ति प्रक्रिया को तुरंत निरस्त करने की सिफारिश की है। कलेक्टर कार्यालय की रिपोर्ट के अनुसार नए भूमि अधिग्रहण कानून और वर्तमान डीएलसी दरों के मुताबिक इस जमीन का कुल मुआवजा 693 करोड़ 33 लाख से अधिक बैठ रहा है। प्रशासनिक दृष्टिकोण से किसी सार्वजनिक कार्य के लिए इतनी बड़ी राशि सिर्फ भूमि अवाप्ति पर व्यय करना वित्तीय रूप से व्यावहारिक नहीं माना गया है। इसके अलावा दूसरा बड़ा कारण यह है कि चंपा बाग की इस भूमि पर वर्तमान में बस्तियां बस चुकी हैं और नगर निगम से इनके पट्टे भी जारी किए जा चुके हैं। ऐसे में इस भूमि का अधिग्रहण करना प्रशासनिक रूप से सुगम नहीं है। 16 जुलाई की सुनवाई से पहले का घटनाक्रम 30 मई, 2024 को जोधपुर हाईकोर्ट ने सरकार को नए सिरे से आपत्तियां सुनकर प्रक्रिया पूरी करने का आदेश दिया था, लेकिन साथ ही यह विकल्प भी दिया था कि यदि सरकार चाहे तो किसी भी चरण में इस अधिग्रहण को छोड़ सकती है। अब यूनिवर्सिटी द्वारा दायर अवमानना याचिका में 16 जुलाई, 2026 को होने वाली अगली सुनवाई से पहले कलेक्टर कार्यालय ने सुप्रीम कोर्ट जाने के बजाय इस प्रक्रिया को रोकने का प्रस्ताव तैयार किया है। मूल अधिसूचना 1994 में कॉलेज शिक्षा विभाग द्वारा जारी होने के कारण, इसे ड्रॉप करने की अंतिम स्वीकृति जयपुर स्तर से ही जारी होगी। रीकॉल : पूर्व राज परिवार से लेकर गट्टानी रिसोर्ट तक, 1981 से 2026 का इतिहास मुआवजे का पूरा गणित: रिपोर्ट में दी गई गणना हाईकोर्ट के आदेश के बाद जब उपखण्ड अधिकारी और तहसीलदार गिर्वा से जमीन के मुआवजे का आकलन करवाया गया, तो देश में लागू नए भूमि अर्जन अधिनियम 2013 के प्रावधानों के कारण मुआवजे की रकम निम्नानुसार आंकी गई है: पहले भी हुए प्रयास: सुविवि के पूर्व कुलगुरु प्रो. अमेरिका सिंह ने भी चंपा बाग की भूमि के लिए कानूनी पैरवी की थी, लेकिन तब मामला नहीं सुलझा था। इस नई रिपोर्ट के बाद अब सुविवि प्रशासन और वर्तमान कुलगुरु प्रो. कैलाश डागा के अगले कानूनी रुख पर नजर रहेगी।