राजस्थान की अफसरशाही व जनप्रतिनिधियों के बीच अक्सर चलने वाली सम्मान की जंग में अब सरकार ने माननीयों का पलड़ा भारी कर दिया है। सरकार ने ब्यूरोक्रेसी को दो-टूक लहजे में समझा दिया है कि संसद और विधानसभा के सदस्यों के सम्मान और प्रोटोकॉल में कोताही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। दरअसल, तीन पुराने रिमाइंडर्स के बाद अब प्रशासनिक सुधार एवं समन्वय विभाग ने मई में नए आदेश जारी किए हैं। यह आदेश सीधे तौर पर सचिवालय के आला अधिकारियों से लेकर जिलों में बैठे कलेक्टर्स और एसपी की टेबल तक पहुंच चुके हैं। इस नए कदम के तहत केंद्र सरकार के कार्मिक मंत्रालय द्वारा जनवरी और मई 2026 में जारी गाइडलाइंस को राज्य में पूरी तरह लागू करने की तैयारी है। सच्चाई यह है कि सियासी गलियारों में यह शिकायतें रही हैं कि जिला स्तर पर अफसर माननीयों के पत्रों का न समय पर जवाब देते हैं और न ही मुलाकातों में तय प्रोटोकॉल का पालन करते हैं। इसी को देखते हुए अब न पुराने नियमों (2022 और 2025 के परिपत्र) को कड़ाई से लागू किया जा रहा है। अब हर विभाग को यह भी बताना होगा कि उन्होंने क्या एक्शन लिया। इससे जनप्रतिनिधियों की नाराजगी भी दूर होगी और बेलगाम होती अफसरशाही पर लगाम भी कसेगी। दिल्ली से जयपुर तक कसी कमान, पुराने 3 आदेशों का हवाला प्रदेश सरकार के नए आदेश की जड़ें जितनी प्रशासनिक हैं, उतनी ही राजनीतिक भी हैं। भारत सरकार के कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग ने 12 जनवरी 2026 और फिर 4 मई 2026 को सख्त आदेश जारी किए। इसी आदेश के आलोक में राजस्थान के प्रशासनिक सुधार विभाग ने अपने इस नए पत्र में साफ लिखा है कि 12 मई 2022 को जारी मूल परिपत्र के साथ-साथ फरवरी 2023 और फरवरी 2025 में भेजे गए दो-दो रिमाइंडर लेटर की पालना को अब हल्के में नहीं लिया जा सकता है। एक्शन टेकन रिपोर्ट से तय होगी कलेक्टर व एसपी की जवाबदेही नए आदेश में सबसे महत्वपूर्ण बात यह जोड़ी गई है कि सभी विभागों को केवल निर्देश जारी करके बैठ नहीं जाना है, बल्कि उनके द्वारा की गई वास्तविक कार्रवाई (एक्शन टेकन) की पूरी रिपोर्ट प्रशासनिक सुधार विभाग को भी भेजनी होगी। इसका सीधा मतलब यह है कि यदि किसी जिले में विधायक या सांसद की उपेक्षा की शिकायत आई, तो गाज सीधे कलेक्टर या पुलिस कप्तान पर गिर सकती है। यह नया आदेश नेताओं की चौखट पर अफसरों की जवाबदेही तय करने का बड़ा सियासी जरिया बनने जा रहा है।