अलवर शहर के सुभाष चौक स्थित भगवान श्रीजगन्नाथ में आज कंगन डोरे बांधने की परंपरा शुरू हो गई। सालों पुरानी मान्यता है कि जिन युवक-युवतियों की शादी में किसी प्रकार की बाधा आ रही हो या शादी तय न हो रही हो, वे भगवान श्रीजगन्नाथ के दरबार में आकर अपने हाथ में कंगन डोरा बंधवाते हैं। इससे पहले भगवान श्रीजगन्नाथ का 11 पवित्र नदियों के जल से जलाभिषेक किया गया। अभिषेक के बाद भगवान को नए वस्त्र धारण कराए गए और विशेष पूजा-अर्चना के साथ कंगन डोरे बांधे गए। इसके साथ ही श्रद्धालुओं के हाथों में भी कंगन डोरे बांधने की परंपरा शुरू हो गई, जिसके लिए सुबह से ही बड़ी संख्या में लोग मंदिर पहुंचे। जल्द शादी की कामना को लेकर बंधवाते डोरे मंदिर के पुजारी पंडित पुष्पेंद्र शर्मा ने बताया कि भक्त श्रीजगन्नाथ के दरबार में आकर अपने हाथ में कंगन डोरा बंधवाते हैं। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि भगवान की कृपा से शादी की बाधाएं दूर होती हैं और शीघ्र शुभ विवाह के योग बनते हैं। इसी आस्था के चलते हर साल बड़ी संख्या में लोग इस दिन मंदिर पहुंचते हैं। उन्होंने बताया कि अब यह परंपरा केवल अलवर तक सीमित नहीं रही है। जयपुर, भिवाड़ी सहित प्रदेश के कई शहरों से व्यापारी भी इस दिन मंदिर पहुंचकर भगवान श्रीजगन्नाथ को अपने कारोबार का साझेदार मानते हैं। विशेष पूजा कर वे अपने व्यवसाय की सफलता और उन्नति की कामना करते हैं। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि भगवान की कृपा से उनके व्यापार में निरंतर प्रगति होती है। भगवान जगन्नाथ हमेशा भक्तों पर कृपा दृष्टि बनाए रखते पंडित पुष्पेंद्र शर्मा ने बताया कि भगवान श्रीजगन्नाथ की आंखें सदैव खुली रहती हैं, जो इस बात का प्रतीक हैं कि वे अपने सभी भक्तों पर हमेशा कृपा दृष्टि बनाए रखते हैं। उन्होंने कहा कि भगवान श्रीजगन्नाथ ऐसे देव हैं, जो स्वयं अपने भक्तों को दर्शन देने के लिए रथ पर सवार होकर नगर भ्रमण पर निकलते हैं। यही कारण है कि उनकी रथयात्रा में लाखों श्रद्धालु दर्शन के लिए उमड़ पड़ते हैं। कंगन डोरे बांधने के साथ कार्यक्रम शुरू उन्होंने बताया कि गुरुवार से कंगन डोरे बांधने का क्रम शुरू हो गया है। 18 जुलाई से 21 जुलाई तक मंदिर में अखंड संकीर्तन का आयोजन होगा। 21 जुलाई को शाम 6 बजे सीतारामजी विवाह स्थल का निरीक्षण एवं कार्यभार संभालने के लिए प्रस्थान करेंगे। इसके बाद 22 जुलाई को भगवान का विशेष अभिषेक और श्रृंगार किया जाएगा तथा शाम करीब 6 बजे सुभाष चौक स्थित मंदिर से रूपबास श्रीजगन्नाथ मंदिर तक भव्य बारात (रथयात्रा) निकलेगी। करीब 6 किलोमीटर लंबी यह रथयात्रा लगभग 14 घंटे में रूपबास पहुंचती है। रास्ते भर भगवान के दर्शन के लिए हजारों श्रद्धालु उमड़ते हैं, जिससे पूरा मार्ग भक्तों से भर जाता है। इसी वजह से यह यात्रा धीरे-धीरे आगे बढ़ती है और अलवर की सबसे प्रमुख धार्मिक परंपराओं में से एक मानी जाती है।