2 जून 2022… झालावाड़ की उस रात में अजीब सा सन्नाटा था। काली सिंध बांध का पानी बिल्कुल ठहरा हुआ था जैसे किसी बड़े तूफान से पहले की खामोशी। दूर तक फैला अंधेरा, बीच-बीच में झींगुरों की आवाज और कहीं दूर से आती मोटर बोट की धीमी गूंज… सब कुछ सामान्य लग रहा था, लेकिन उस रात कुछ भी सामान्य नहीं था। शुरुआत हुई एक फोन कॉल से जो शायद सामान्य बहस लग रही थी, लेकिन उसके शब्दों में जहर भरा था। एक तरफ था मुख्तार मलिक। भोपाल का कुख्यात गैंगस्टर, जिसके नाम से ही कई शहरों में लोग सतर्क हो जाते थे। उसके खिलाफ दर्जनों मामले थे और सालों से वह अपराध की दुनिया में अपना नेटवर्क बना चुका था। दूसरी तरफ था अब्दुल बंटी, जो खुद भी उसी अंधेरी दुनिया का हिस्सा था, जहां दोस्ती और दुश्मनी दोनों का फैसला ताकत से होता है। दोनों गुटों ने एक-दूसरे को धमकी दी फोन पर हुई बहस में गाली-गलौज थी, अहंकार था और सबसे ज्यादा चुनौती थी। यह मछली ठेकेदारी का विवाद बताया गया, लेकिन असल में यह सिर्फ एक बहाना था। असली खेल था इलाके पर कब्जे का, पैसे का और उस वर्चस्व का, जो अपराध की दुनिया में सबसे बड़ा हथियार होता है। दोनों पक्षों ने एक-दूसरे को धमकी दी… और यहीं से कहानी ने एक खतरनाक मोड़ ले लिया। रात होते-होते सब कुछ तय हो चुका था। यह कोई अचानक होने वाला टकराव नहीं था। यह एक जाल था, जो पहले से बिछाया जा चुका था। काली सिंध बांध का वह इलाका चुना गया, जहां रात में कोई आसानी से पहुंच नहीं सकता। पानी के बीच का रास्ता इसलिए चुना गया, ताकि हमला भी हो सके और बच निकलना भी आसान रहे। मुख्तार मलिक अपने साथियों कमल और विक्की वाहिद के साथ मोटर बोट में बैठकर उस इलाके की ओर बढ़ रहा था। शायद उसे अंदाजा था कि सामने वाले आएंगे, लेकिन उसे यह अंदाजा नहीं था कि यह सिर्फ मुलाकात नहीं, बल्कि मौत का सामना होगा। बोट पानी को चीरती हुई आगे बढ़ रही थी और हर सेकेंड उसे उस जगह के करीब ले जा रहा था, जहां पहले से उसका इंतजार हो रहा था। अंधेरे में से ताबड़तोड़ फायरिंग होने लगी दूसरी तरफ, अंधेरे में छिपे लोग पूरी तरह तैयार थे। उन्होंने अपनी पोजिशन ले ली थी। हथियार तैयार थे। नजरें सिर्फ एक दिशा में थीं- जहां से मोटर बोट आने वाली थी। जैसे ही मोटर बोट पास आई, कुछ सेकेंड के लिए सब कुछ बिल्कुल शांत हो गया और फिर अचानक गोलियों की आवाज ने उस खामोशी को चीर दिया। ताबड़तोड़ फायरिंग शुरू हो गई। एक के बाद एक गोलियां चलीं। पानी में गोलियों की आवाज गूंजने लगी। बोट डगमगाने लगी और चीखें उस अंधेरे में खोने लगीं। यह हमला इतना तेज और सटीक था कि संभलने का मौका ही नहीं मिला। बताया जाता है कि दोनों तरफ से फायरिंग हुई, लेकिन जो घात लगाकर बैठे थे, उनके पास बढ़त थी। उन्होंने हर मूवमेंट पहले से सोच रखा था। यह कोई झगड़े का अचानक भड़कना नहीं था, यह एक सोची-समझी साजिश थी, जिससे बच निकलना लगभग नामुमकिन था। कुछ ही मिनटों में सब खत्म हो गया। गोलियों की आवाज बंद हो गई। पानी फिर से शांत हो गया। लेकिन उस शांति के नीचे तीन जिंदगियां डूब चुकी थीं, या कम से कम ऐसा लग रहा था कि मुख्तार मलिक… कमल… और विक्की वाहिद, तीनों गायब थे। पानी में एक शव मिला अगले दिन जब पुलिस पहुंची और सर्च ऑपरेशन शुरू हुआ, तो सच्चाई धीरे-धीरे सामने आने लगी। पानी से कमल का शव मिला। लेकिन बाकी दो का कोई पता नहीं था। यह रहस्य और गहरा हो गया। क्या वे भी मारे गए? या कहीं छिपे हैं? इसी बीच खबर आई कि विक्की वाहिद जिंदा है और किसी तरह वहां से निकलकर भोपाल पहुंच गया है। इसका मतलब था, हमले में कोई बच भी गया था। लेकिन सबसे बड़ा सवाल अभी भी बाकी था, मुख्तार मलिक कहां है? दो दिन तक तलाश चलती रही। पानी, जंगल, आसपास के इलाके, हर जगह खोजबीन हुई। और फिर जंगल के अंदर एक घायल मिला। वह था- मुख्तार मलिक। उसे तुरंत हॉस्पिटल ले जाया गया, लेकिन शरीर पर इतने जख्म थे कि डॉक्टर भी ज्यादा कुछ नहीं कर सके। कुछ ही देर में उसने दम तोड़ दिया। उसकी मौत के साथ ही एक और कहानी शुरू हो गई एक ऐसी कहानी, जिसमें सच्चाई अभी भी अधूरी थी। यह साफ था कि यह हमला योजनाबद्ध था, लेकिन असली सवाल अभी भी बाकी था- यह सब क्यों हुआ? कल पढ़िए इन सवालों के जवाब…