ब्यावर |आचार्य रामेश के शिष्य शासन दीपक श्रुत प्रभजी म.सा. ने समता भवन में प्रवचन देते हुए बताया कि भगवान महावीर के जीवन की विशेषता रही। छद्मस्थ अवस्था से लेकर दीक्षा के बाद भी वे सदैव ध्यान में रहते थे। वे सदैव चिंतन करते रहे। लोगों को सुख कैसे मिले। मनचाहा हो जाए। अनचाहा चला जाए। यानी सुख आए। दुख चले जाएं। म.सा. ने कहा कि आज हम जिसे नहीं चाहते, उससे पिंड छुड़ाना चाहते हैं। जैसे गरीबी से, बीमारी से, बुजुर्गों से पिंड छूट जाए। शांति मिल जाए। लेकिन पिंड छूटना आसान काम नहीं। कर्म भोगना पड़ेगा। तभी छूटेगा। पूर्व जन्म में किए कर्म भोगे बिना शांति नहीं मिलेगी। नया कर्म भी नहीं बांधेंगे। भविष्य की मत सोचो। पुरुषार्थ करते रहो। म.सा. ने कहा कि हर समय सुख की नहीं सोचें। जो होगा, वह अरिहंत भगवान चाहेंगे। वही होगा। अपनी ऊर्जा सोचने में व्यर्थ न करें। जो हो रहा है, उसे स्वीकार करें। आर्त ध्यान मन को नियंत्रित नहीं कर सकता। धर्म में रस नहीं आने पर हम संसार बढ़ाते जा रहे हैं। आर्त ध्यान बढ़ता है तो कर्म बंधता जाता है। विचारों पर नियंत्रण करना है तो निरंतर स्वाध्याय करते रहें।